कितना मर्मस्पर्शी है किसी का अनाथ हो जाना – सुजाता प्रसाद

ये तो सच है कि भगवान है
मगर फिर भी अनजान है
धरती पे रूप माँ बाप का
उस विधाता की पहचान है।

इस गाने की पंक्तियों को पढ़कर, सुनकर लगता है कि हममें से हर किसी की भावनाओं के माध्यम से उस शाश्र्वत सत्य को बयां कर दिया गया है, जिसमें माता पिता की महिमा कही गई हो और जिसे हम सबने महसूस किया है। इस दुनिया में नि: स्वार्थ प्यार सिर्फ माता पिता ही कर सकते है। माता पिता के बारे में कहा भी गया है कि दुनिया में दो ही सच्चे ज्योतिषी हैं, मन की बात समझने वाली माँ और भविष्य को पहचानने वाले पिता। वे बच्चे सौभाग्यशाली होते हैं, जिनके माता-पिता होते हैं। जिनकी परवरिश माता पिता के सानिध्य में होती है और अपना बचपन सुनहरे पल की तरह जीते हैं।

हम कल्पना करके देखें कि, बच्चे जो इस धरती के सबसे अनुपम उपहार होते हैं, अगर उनके सिर पर माता पिता का साया नहीं मिले तो उन बच्चों के जीवन में कितनी रिक्तता आ जाती होगी। हम सब जानते हैं कि बचपन का समय हर व्यक्ति के जीवन का सबसे सुनहरा समय होता है। हमने अक्सर देखा है कि कई बच्चे ऐसे भी होते हैं जो कई कारणों से बचपन में ही अनाथ हो जाते हैं और सड़कों पर भटकते हुए अपना बचपन व्यतीत करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। ऐसे बच्चों के लिए प्रथम परिभाषा यही कहती है कि वे जिनके माता-पिता की मृत्यु हो गई हो, वे अनाथ हो जाते हैं। कितना मर्मस्पर्शी है किसी का अनाथ हो जाना। अर्थात अनाथ वह व्यक्ति है जिसके माता-पिता जीवित ना हों या जिनके माता-पिता के बारे में कोई जानकारी न हो यानी जो अज्ञात हों या जिन्होंने उसे उसे स्थायी रूप से त्याग दिया हो।

कभी कभी हमारी भावनाएं सिर्फ उमड़ती ही नहीं, हमसे कुछ कहती भी हैं, हमसे जूझती भी हैं। उनमें से एक स्थिति तब आती है जब अनाथ बच्चों की असीम पीड़ा को महसूस कर मन व्यथित हो जाता है। अनाथों की बेबस तस्वीर आंखों के सामने गुजरने लगती हैं। उनकी समस्याएं, उनका दुःख जिसे समाज के एक अलग तबके के रूप में देखा जाता है, क्या किसी और की समस्या से कम होती हैं? नहीं, बल्कि कुछ ज्यादा ही होती होगी, जिसका सामना उन्हें रोज़ करना पड़ता है। मुसीबत के मारे इन बच्चों की सुध लेने वाला कोई नहीं होता। अनाथ होना एक बच्चे के लिए सबसे बड़ा अभिशाप बन जाता है। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि नियति ने कुछ मासूम बच्चों के साथ इतना क्रूर मज़ाक कैसे कर लिया होगा? उनकी पीड़ा को हम अपने परिवार के साथ रहने वाले शायद नहीं समझ सकते हैं। विषम परिस्थितियों में बच्चे को अनाथालय के द्वार पर छोड़ आना आसान हो सकता है लेकिन एक अनाथ के रूप में पूरी जिंदगी बिताना अत्यंत कठिन होता होगा। कई बार तो प्राकृतिक आपदा की क्रूरता से भी मासूम बच्चे अनाथ होने के लिए अभिशप्त हो जाते हैं। और तो और अनेक अध्ययन और कई आंकड़े बताते हैं कि भारत में बड़ी संख्या में अनाथ बच्चों को शिक्षा और अन्य कल्याणकारी उपायों तक पहुंचने के लिए अकेले ही संघर्ष करना पड़ता है। जिनमें से कुछ बच्चे तस्करी के शिकार हो जाते हैं और फिर उन्हें अनैतिक कामों में भी धकेल दिया जाता है।

कहते हैं कि माँ एक ऐसी बैंक है जहाँ आप हर भावना और दुख जमा कर सकते है और पिता एक ऐसा क्रेडिट कार्ड है जो हमारे सपने पूरे करने की कोशिश करते हैं। इसी बात को चरितार्थ करते हुए अनाथों के लिए माता-पिता दोनों के रूप में सिंधु ताई सकपाल का अपना एक नाम है, अपनी एक पहचान है। विशेष रूप से इन्हें “अनाथों की मां” के नाम से जाना जाता है। उनका दिन रात अनाथों की सेवा में रत रहना, अनाथों के जीवन में दिया जा रहा बहुत बड़ा योगदान है। संपूर्ण मानव समुदाय के लिए मानवता का बहुत बड़ा उदाहरण हैं सिंधु ताई सकपाल। हमारा भी यह कर्तव्य होना चाहिए कि हमें उन बच्चों के दर्द को समझने की कोशिश करना चाहिए। अनाथ बच्चों के प्रति सिर्फ दया भावना दिखाने से अनाथ बच्चों की समस्याएं नहीं सुलझ जाएंगी। इसके लिए समाज के सक्षम लोगों का आगे आना और मानव धर्म की महत्ता को समझ उन बच्चों के भविष्य को सुधारने में अपना अपना योगदान देना एक महत्वपूर्ण भूमिका होगी।

अनाथों की शरणस्थली अनाथालय के बच्चों के लिए कुछ कर पाना अपेक्षाकृत आसान होता है। संवेदनशील भारतीय समाज में कुछ लोग हैं जो अनाथ बच्चो को गोद लेते है और अपने भरपूर प्यार से, अपनी देखभाल से उनका जीवन संवार देते हैं। ऐसा भी होता है जब कई लोग चाहते हुए भी एक अनाथ को अपना नहीं सकते, फिर भी वे अपना सार्थक योगदान देने से पीछे नहीं हटते हैं। जैसे कई स्कूलों में अपनी शिक्षा पा रहे बच्चों को यह तक नहीं पता होता है कि उनके माता-पिता कौन हैं, जो उनकी शिक्षा का ख़र्च वहन कर रहे हैं और वे उनके प्यार और दुलार से वंचित रहते हुए भी महसूस कर रहे होते हैं कि वे कितने सौभाग्यशाली हैं। ऐसे ही मां के आंचल और पिता की गोद की अभिलाषा में कई बच्चे अनाथ आश्रम के ऑफिस में रोज़ बुलाए जाते हैं, जब निःसंतान दम्पति उन्हें गोद लेने आते हैं। जिनमें से कुछ ही खुशकिस्मत होते हैं जिन्हें माता पिता मिल जाते हैं।
जरूरतमंद अनाथ बच्चों की मदद करना मानवता को संरक्षित करने जैसा ही है और श्रेष्ठ मानव धर्म भी। लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि हमारे द्वारा की गई मदद सही तरीके से की गई है या नहीं। मतलब हमारी मदद उन बच्चों के काम आ रही है या किसी अन्य स्रोत का ज़रिया बन कर व्यर्थ जा रही है।

हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि हम सब जब भी ऐसे किसी बच्चे को देखें तो अपनी क्षमता के अनुसार उनकी मदद करें, यह मदद किसी भी रूप में हो सकती है, जैसे अगर उनका आशियाना सड़कों के फुटपाथ हों तो उन्हें रहने के लिए अनाथालय में शिफ्ट करा सकते हैं, उन्हें खाना दे सकते हैं, उन्हें कपड़े दे कर या कुछ अनुदान देकर भी सहायता की जा सकती है। अनाथ बच्चों के चेहरे पर खुशी लाने के लिए आप उन्हें उपहार में उनके उपयोग में आने वाली चीजें दे सकते हैं। आप उन्हें खाना, नाश्ता, पर्व त्यौहार के मौके पर कपडे, पढाई का सामान, कॉपी किताबें, पेन-पेन्सिल, जूते चप्पल, बैग टीफिन, रजाई कंबल, चादर गद्दे, फल मिठाइयाँ भी दे सकते हैं।

अनाथों की इतनी बड़ी संख्या पर अगर विचार करें तो शायद हमारी मदद भी थोड़ी ही प्रतीत होगी।विचारणीय विषय तो यह भी होना चाहिए कि इनके लिए एक ऐसे समाज को विकसित किया जाए, जिसका हिस्सा होकर कोई भी बच्चा अनाथ होकर भी अपने को अनाथ ना समझे। इन्हें भी बराबरी का मौका देते हुए इनके भविष्य निर्माण की दिशा में कार्य होने चाहिए। किसी भी बच्चे को भूखा ना सोना पड़े ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए। इनके अच्छे स्वास्थ्य के लिए उनकी चिकित्सीय जाँच और दवाइयों का इंतजाम होना चाहिए। अगर आप फाइनेंशियल रूप से सक्षम हैं तो अनाथ बच्चों को आर्थिक रूप से सहायता कर सकते हैं। शिक्षित व्यक्ति अनाथ बच्चों को पढ़ाकर समाज में शिक्षा की ज्योति जगा सकते हैं। अनाथ बच्चों के साथ अपना जन्मदिन मनाकर भी उन्हें खुशियां दे सकते हैं, खुशियां पा सकते हैं। आइए कुछ ऐसा करें कि इन बच्चों के जीवन के दिन होली के रंगों से भर कर बिखर जाएं, दीपावली के दीयों की तरह इनकी रात जगमग हो जाएं।

लेखिका
सुजाता प्रसाद
(निवास स्थान : नई दिल्ली , पैतृक निवास : पटना)

शिक्षा : स्नातकोत्तर हिंदी, स्नातक विज्ञान प्रतिष्ठा, शिक्षा विशारद विज्ञान, डी.सी. एच.(डिप्लोमा इन क्रिएटिव राइटिंग) एवं अन्य।
संप्रति : शिक्षिका (सनराइज एकेडमी), स्वतंत्र रचनाकार, मोटिवेशनल वक्ता।
रूचिः
रचना-सृजन, स्वतंत्र-लेखन एवं साहित्य पठन-पाठन में संलग्न, काव्य गोष्ठियों तथा सम्मेलनों में भागीदारी, सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में समयानुसार सक्रिय।

उपलब्धिः
काव्य संग्रह “अनुभूतियों की काव्यांजलि”कौटिल्य पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित।
कई स्वतंत्र एवं साझा संकलन प्रकाशित। राष्ट्रीय समाचार पत्रों, विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में और लोकप्रिय वेबसाइट्स पर रचनाओं का प्रकाशन आदि।

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