“आत्महत्या”… दीपिका आनंद की रचना

“आत्महत्या “

जीवन के एक दौर में ,
ऐसा डगर भी आएगा ,
तू बढ़ना तो चाहेगा आगे ,
पर तेरा हर कदम लड़खड़ाएगा।

हृदय में उठती वेदना की ज्वाला को,
भला कैसे तू बुझाएगा ?
मन की खलिश को बाँटू किससे,
कि अपने आसपास तुझे कोई नहीं भाएगा।

चित्त की शांति की खातिर ,
तू कुछ नए कदम तो उठाएगा,
पर अपने इन प्रयासों में भी ,
तू खुद को विफल सा पाएगा।

अंततः हारकर,परेशान होकर
तू आत्महत्या को ही अपनाएगा,
खत्म हो जाएंगे मेरे सारे रंज,
ये सोच कर तू मौत को गले लगाएगा ।

तेरी मौत सिर्फ तेरी नहीं होगी,
कि तेरा हर अपना विह्वल हो जाएगा,
शोकाकुल हुए तेरे प्रिय जनों को,
अब भला कोई कैसे समझाएगा ?

प्राणों की आहुति दे कर तेरा शरीर,
भले ही मिट्टी में मिल जाएगा ,
अनश्वर आत्मा अशांत होकर यूं ही,
दर-दर भटकता रह जाएगा।

इस शरीर को मिटाकर के तुम,
क्या अपनी समस्याओं से उबर पाओगे?
खुद को खुदकुशी की भेंट चढ़ा कर,
तुम केवल कायर ही कहलाओगे।

कवयित्री : दीपिका आनंद (शिक्षिका), पूर्णियाँ, बिहार

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