रात के इंतजार मे सुबह से मुलाकात हो गई… डॉ. उमा पिथौरा

रात के इंतजार मे सुबह से मुलाकात हो गई ।
शायद वो कल की शाम ढलना ही भूल गई ।।
मै हू या कि वाकई हू ही नही?
वजूद मेरे से, किस्मत छल कर गई ।।

खुशियाँ तो दामन भर भर मिली।
जितना ना सोचा पग-पग मिलीं।
तलाश जब भी करी, वो सब था ।।
जिसकी की आरजू मे ये दुनिया जली।।

फिर क्या था जो लगता खोया सा था?
भ्रम मे थी या वाकई भाग्य सोया सा था?
सब कुछ दे भी दिया जो कोहिनूर था।।
तब भी तो ना पाया जो इक सुरूर था।।

कोई जो पल हो वो मेरा ही हो।
रिश्तों का सौदा न हो न कोई खेल हो।।
माना सियासत का ये दौर है।
जो जितना है शतरंजी वो ही सिरमौर है।

हास्य- व्यंग्य ,चालों के धारावाहिक सा।
जीवन उलझकर रह गया मकड़जाल सा।।
खुद ही बुना था गलीचा अरमानो का।।
पैर फँसने ही धे धोखों का दलदल जो था।

क्योंकि वजह ही नही कोई।
कोई सोचे ,गर दुनिया हमारी उजड भी गई।
किसी का क्या ? उसका आखिर गया ही था क्या?
कफन तो हमपे चढे वो तो बस उसपे चढ़कर गए।।

उफ भी ना की ,ना हम करते गिला भी कोई।
पलटते एक भी बार पूछते , ददॅ है कोई?
अहसास ही दफन हो लोगों का जब स्वाथॅ साधने मे।
हम अब भी क्यों हैं इंतजार मे,
गफलत मे, झूठे रौशन मे?

कुछ नहीं होना यहाँ किसी एक भी शय मे।
क्योंकि ढाई अक्षर तो कब का बिक गया स्व की अतिशय मे।
एक पूरा समंदर भावों तो जब था।
जब हम थे काम के उनके और हमसे काम रौशन था।

बस हम ही हैं खुद के , ये जग पराया है।
खुद के कंधों पे जब टिके तब ही जीना आया है।
कोई होता नही अपना, बस एक ये ही तो सच है।
ये जान ले सब तो ही ,वनाॅ खुशी ना मयस्सर है।

दौडा दौडा के तो ये जिंदगी यों थकायेगी।
रूको तो भी कहाँ ?
ठहराव होगा कहीं तभी तो ये दे भी पाएगी।
तो फिर बेकार है , कोशिश
और फिजूल हर यत्न है।
किस्मत अगर सिर्फ तृष्णा है?
तो तृप्ति झूठा बस इक स्वप्न है।

ठहर जाओ , जहाँ हो तुम ।
जो भी हो , वही हो तुम।
और जो भी हो , बहुत बेहतर हो।
कोई अगर कुछ हो जाए वो जो सपने धे तुम्हारे धे।
तो होने दो गर तुम रास्ता थे तो फिर कहाँ से कमतर हो?
क्योंकि मंजिलें तो बस इक स्वाद है इक पल है।
वो तो लंबे रास्ते हैं जिनसे ये मयस्सर हैं।
तुम खुद को ही तो खोजो।
तुम खुद को तो पहचानो।
तुम खुद को करो रौशन।

उम्मीदे ना रखना कभी भी इस संवेदनहीन दुनिया से।
कत्ल कर के भी हँसती हुई छलेगी कृतघ्न सी।
पर हाँ , कभी टूटो भी तो ,
खुद को इतना बचा लेना।
कि कोई लगे अगर गिरने , अगर टूटे।
तो ये पहला धमॅ है कि
तुम उसको सँभाल लेना।।।।

स्वरचित
डॉ. उमा पिथौरा

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