मंजूषा चित्रकला : अंग प्रदेश के साथ ही बिहार की अमूल्य धरोहर

अंग मंजूषा चित्रकला अंग प्रदेश की अमूल्य धरोहर है मंजूषा का शाब्दिक अर्थ होता है सजा हुआ कक्ष या सजी हुई पिटारी | किन्तु अंग महाजनपद में आज के संदर्भ में जो लोक कला अंग मंजूषा चित्रकला के नाम से विख्यात है उसका एक अलग हीं स्वरूप है, अलग हीं पहचान है।

बिहुला विषहरी लोकपर्व पर आधारित लोक व पारम्परिक कला है इस अवसर पर मन्दिर नुमा पिरामिड आकार का बहुमंजिला एवं एकमंजिला जलयान बनाया जाता है जिसे मंजूषा के नाम से जाना जाता है। शोला, सनई एवं कागज से बना मंजूषा छोटा,मंझोला, बड़ा एवं विशाल आकार का होता है, शोला, सनई एवं कागज से बने मंजूषा पर हीं चितेरे बिहुला बिषहरी लोकगाथा को चित्र के माध्यम से दर्शाते है जो अंगमंजूषा चित्रकला के नाम से जाना जाता है। मंजूषा निर्माण के समय कलाकार मंजूषा के लम्बाई के बराबर चौड़ाई एवं उसी अनुरूप गुम्बज की लम्बाई बनाते हैं जिससे मंजूषा चकोर मंदिरनुमा जलयान के रूप में दिखाई पड़ता है। मंजूषा के छत के चारो कोनों एवं गुम्बज के ठीक ऊपर नाग फन उठाये बनाया जाता है जो मंजूषा की खास विशेषता है मंजूषा को आकर्षित बनाने के लिए कलाकार इस पर गोटा, लेस,चमकदार कागज चिपकाते है लेकिन इसकी खास पहचान इसमें बने लोकचित्र होते।

अंगजनपद (भागलपुर) में बिषहरी पूजा 17 एवं 18 अगस्त इस अवसर पर हर मनसा मन्दिर में मंजूषा को स्थापित किया जाता है इससे एक माह पूर्व अर्थात 17 जुलाई की मनसा मन्दिर में बारी (मंजूषा पार्ट) जो कच्चे मिट्टी का नागलंकृत एक नाग कलश होता है स्थापित किया जाता है और उसी दिन से मनसा पूजा आरम्भ माना जाता है जो 17 अगस्त को मंजूषा स्थापना से पूर्ण एवं 18 अगस्त को मंजूषा विसर्जन कर सम्पूर्ण होता है।

यूँ तो मंजूषा कई रूपों में पूरे सनातन संस्कृति से जुड़ा है जैसे जब कोई कुवांरी कन्या माँ बन जाती है तो लोक-लाज के भय से उसे मंजूषा में रखकर जल में बहा कर अपने पाप का प्राश्चित करती है वहीं इसे पाने वाला अपने आप को धन्य मानते हुए गंगा माँ का वरदान समझ कर स्वीकार करते हैं। कार्तिक में दिप मंजूषा नदी या सरोवर में प्रवाहित करने की परम्परा है। बसन्त में पुष्प मंजूषा,विभिन्न प्रकार के मनमोहक पुष्पों से सजा मंजूषा। वैशाख में नवान्न मंजूषा इत्यादि। लेकिन मंजूषा का भव्य एवं वास्तविक रूप बिहुला बिषहरी के लोक पर्व के अवसर पर अंगक्षेत्र में दिखलाई पड़ता है। ग्राम से लेकर शहर तक पूरा अंगदेश मंजूषामय हो जाता है हर ओर बिहुला बिषहरी की लोकगीतों के कर्णप्रिय धुन पर थिरकतें मंजूषामय पूरा का पूरा वातावरण।

मंजुशाचित्रकला की खोज का जन्म अंग की राजधानी चम्पा से हुई थी यह कला अत्यन्त प्राचीन कला है मंजूषा कला एशिया की पहली लोककला व पारम्परिक कला है जो अपने आप में सम्पूर्ण कला है वैदिक इतिहासकारों की माने तो यह कला सिंधुघाटी सभ्यता में भी विकसित थी यह कला अत्यन्त प्राचीन है। समय के कालखण्ड में यह कला विलुप्त हो गई थी 1934 से 1942 ई. को इस कला का पुनर्जागरण काल माना जाता है इस समय अंग्रेजी हुकूमत के I C S अधिकारी W. C आर्चर्ड भागलपुर में कलेक्टर के रूप में पदस्थापित थे वे कला एवं संस्कृति के शोधकर्ता भी थे उन्होंने मंजूषा कला की खोज की उन्होंने पाया कि यह कला निम्न जाति द्वारा संरक्षित कला है जो सिर्फ पर्व त्योहारों एवं बिषहरी पूजा के अवसर पर बनाया जाता है।

W. C आर्चर्ड ने मंजूषा कला का संकलन कर लन्दन के ईस्ट इंडिया हाउस में प्रदर्शित कर अंतराष्ट्रीय स्तर पर रखने का प्रयास किया। 1970-71 के दशक में चम्पानगर के डीह की खुदाई के दौरान कई प्राचीन ऐतिहासिक अवशेषों के साथ-साथ मानव रहित नाग अलंकरण के जोड़े एवं टेराकोटा आधारित मंजूषा कला भिति चित्र पाया गया था। पुरात्तव विभाग द्वारा इस मिट्टी की जांच में वर्तमान टुकनी टोला चम्पानगर नागलनकरण से युक्त काला ग्रेनाइट पत्थर एवं आहत सिक्के का मिलना इस क्षेत्र की प्राचीनता को दर्शाता है नागअलंकरण से युक्त पत्थर देवी मनसा के द्वार का खण्डित हिस्सा है पुरातात्विक विश्लेषण में यह 7वी शताब्दी में बना माना जाता है जो संभवतः बारहवीं शताब्दी के विदेशी आक्रमणकारियों का शिकार हो गया होगा चम्पानगर क्षेत्र के छोटे-बड़े तमाम मन्दिरों यहाँ तक कि कई वृक्षो के नीचे पत्थर के छोटे – बड़े कई अवशेष देखे जा सकते है जो समय -समय पर यत्र तत्र भूगर्भ से निकले से निकले है कई स्तम्भ के टुकड़े जिसपर नाग अलंकरण बने है इस क्षेत्र का नाग के साथ जुड़ाव एवं श्रद्धा को दर्शाता है। कमपूजिया(कम्बोडिया) में मंजूषा आकार का नागअलंकरण से युक्त विशाल मंदिर है जो इस बात का घोतक है कि प्राचीनकाल में चम्पा के बनिक वर्ग बहुत बड़ी संख्या में कम्बोडिया में बस गए होंगे और पानी संस्कृति एवं परम्परा की नींव मंजूषा आकार का मंदिर बनवाकर डाली होगी।

मंजूषा चित्रकला पर पहली पर्दशनी 1978 ई. में मंजूषा चित्रकला सह पुरातात्विक पर्दशनी17 एवं18 अगस्त मनसा पूजा के अवसर पर श्वेताम्बर जैन मन्दिर चम्पानगर भागलपुर में लगाया गया था। अंग महोत्सव सह कला पर्दशनी मारवाड़ी पाठशाला परिसर 1988ई. मंजूषा चित्रकला स्लाइड शो शिलिप्का कला केंद्र भागलपुर द्वरा 1989ई. मंजूषाकला संगोष्ठी ललित भवन 1991ई. मंजूषाकला कार्यशाला सह पर्दशनी पूर्वी क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र कलकत्ता एवं बिहार ललित कला अकादमी पटना द्वारा प्रायोजित बिहार राज्य खादी ग्रामोद्योग भवन D. N सिंह रोड भागलपुर में 1998 लगाया गया इस कार्यशाला में इस क्षेत्र के10 कलाकारों ने भाग लिया था इसी अकादमी द्वारा पटना में मधुबनी मंजूषा चित्रकला का A. N सिंहा इंस्टीट्यूट के परिषर में मार्च 1998 को 3दिनों के लिये लगाया गया था2005 से स्थानीय कलाकारों मंजूषा महोत्सव मनाना आरम्भ किया और धीरे-धीरे भव्य आकार लेता मंजूषा चित्रकला 2016 में बिहार सरकार द्वारा मंजूषा महोत्सव सह कला प्रतियोगिता मनाया जा रहा है।

यूँ तो मंजुष चित्रकला लोकपर्व बिहुला-बिषहरी की कथा पर आधारित है लेकिन मंजूषा के साथ अंग का अत्यन्त हीं प्राचीन एवं घनिष्ट सम्बन्ध है तब इस भूभाग का नाम पूर्व या प्राच्य देश था। दैत्यराज बलि अपनी विश्वविजय यात्रा के क्रम में पूर्व देश मे बिहार कर रहे थे, गंगा स्नान की हमारी पुरानी परम्परा है किसी पुण्यतिथि पर राजा बलि गंगा स्नान कर रहे थे तभी उन्हें गंगा की धारा में बहता हुआ एक मंजूषा दिखाई दिया सेवकों से मंजूषा निकलवाकर देखा तो उस मंजूषा में किसी ने दीर्घतमा ऋषि को समाधिस्थ अवस्था में बांधकर गंगा में प्रवाहित कर दिया था। राजा बलि ऋषि को अपने महल ले आए और पूजा एवं सत्कार से ऋषि को प्रसन्न किया जब प्रसन्न दीर्घतमा ऋषि ने वर मांगने को कहा तब राजा बलि ने पुत्रहीनता का दुःख प्रकट किया चूंकि राजा बलि पुत्र उतपन्न में असमर्थ थे इसलिए रानी सुदेशना एवं दीर्घतमा ऋषि के नियोग विधि द्वारा पांच पुत्र उतपन्न हुए अंग ,बंग,कलिंग,पुण्ड और सुह्म। इन पांचो पुत्रों के नाम पर हीं क्रमशः पांच राज्य हुए जेष्ठ पुत्र अंग के नाम पर प्राच्य देश का नाम अंगदेश हुआ। जब त्रेतायुग में अंगदेश पर राजा रोमपाद का शाशन था उसी समय अंगदेश में भीषण अकाल पड़ा था। चारो ओर त्राहीमाम था अकाल मुक्ति का एकमात्र उपाय था अंग की धरती पर श्रृंगी ऋषि का चरण रज पड़ना। पूरे नगर में यह बात आग की तरह फैल गई कि जो श्रृंगी ऋषि को यहाँ लायेगा राजकोष से स्वयं के बराबर स्वर्ण मुद्रा पायेगा। पूरे राज्य में श्रृंगी के क्रोधी पिता विभांटक के भय से किसी ने श्रृंगी को लाने का साहस नहीं किया तब अंग की नगरबधू ने यह बीड़ा उठाया और उस समय भी श्रृंगी को लाने के लिए विशाल मंजुषा बनाया गया था। नगरबधू ने अपने रूप,यौवन,साहस और युक्ति से श्रृंगी को अंग की राजधानी मालिनी की धरा पर लाकर अंग को अकाल मुक्त किया था। राजा रोमपाद ने अपने मित्र राजा दशरथ की पुत्री शांता का विवाह श्रृंगी ऋषि से कर अपना जमाता बनाया था कलांतर में यही श्रृंगी राजा दशरथ से पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाया था। द्वापर में जब कुवांरी कुन्ती सूर्य देव की कृपा से माँ बनी थी तब लोक लाज के भय से नन्हे कर्ण को मंजूषा में रखकर बहा दिया था, जो बहता हुआ अंग की राजधानी चम्पा में आ लगा था और अधिरथ भार्या राधे ने गंगा माँ का आशीर्वाद समझकर कर्ण का पालन-पोषण किया था मंजूषा सूर्यपुत्र को सूतपुत्र बनने का भी साक्षी है। लेकिन मंजूषा को एक अलग स्वरूप एक अलग पहचान दिया चम्पा के तन्तु बनिक वैश्य चन्द्रधर सौदागर की बधु बिहुला ने। बिहुला अपने ससुर एवं देवी बिषहरी के विरोध के भेंट चढ़ चुके अपने पति बाला लक्षमेन्द्र को जीवनदान दिलाने हेतु स्वर्ग जिस साधन से जाती ह वह जलयान मंजूषा के नाम से जाना जाता है।

मंजूषा चित्रकला को ठीक से समझने के लिए बिहुला-बिषहरी की लोकगाथा को जानना अति आवश्यक है ख्यात कथा के अनुसार शिव की मानस पुत्री मनसा पृथ्वी पर नाग पूजा चाहती थी उन्हें शिव से वरदान प्राप्त था कि चम्पा के बनिक चन्द्रधर से प्रथम पूजा प्राप्त करने से संसार में नाग पूजा होने लगेगी। जब देवी मनसा चन्द्रधर से पूजा लेने पहुंची तो शिवभक्त चन्द्रधर ने मना कर दिया और शिव के शिवाय किसी की भी पूजा नहीं करने का अपना अटल निश्चय सुना दिया । क्रोधवश मनसा ने उनके छवो पुत्रों सोनामुखी जहाज नौकाएं मल्लाह इत्यादि को त्रिवेणी में डुबो दिये और सातवें पुत्र लक्षेन्द्र को अभेद लौहगृह में विवाह की प्रथम रात्री में हीं सर्प से डँसवा कर मार दिया तब लक्षमेन्द्र की पत्नी बिहुला ने लज्जा का त्याग कर कहा कि मैं अपने पति को लेकर जलमार्ग से स्वर्ग जाऊंगी अतः मेरे लिए एक विशाल लौह मंजूषा का निर्माण किया जाए। चन्द्रधर के आहवाहन पर विश्वकर्मा ने लौह मंजूषा का निर्माण किया उसके बाद बिहुला ने उस समय के प्रसिद्ध चितेरे लहसन मालाकार से मंजूषा लिखवाई इसमें बिहुला ने अपने ससुराल एवं मायके से जुड़े व्यक्ति स्थान एवं चिन्ह का वर्णन करवाया उसी मंजूषा पर अपने पति एवं पति को मारने वाला नागमनियर को ले कर सवार हो कर गोकुल गंगा घाट से अपनी स्वर्ग यात्रा आरम्भ किया। अति दुर्गम मार्ग और संकटों से जूझते हुए नेतुलघाट पहुंची जहां वो नेतुला के सहयोग से स्वर्ग पहुंचती है और अपनी अकाल भक्ति नृत्य से देवताओं को प्रसन्न कर अपने सत्य पतिव्रत धर्म साहस से देव शक्ति को चुनौती दे कर अपने पति सहित सभी जेष्ठों मल्लाहों एवं सम्पत्ति को प्राप्त कर चम्पा वापस आती है और अपने ससुर को मना कर देवी मनसा की पूजा करवाती है और धरती पर नाग पूजा का सूत्रपात होता है।

मंजूषा चित्रकला अपने आप में सम्पूर्ण कला है एक और पंक्ति पर दृष्टिपात करते हैं-
होरे लिखवे-लिखवे रे मलिया रे मन्जोषा जे लिखवे रे
होरे पनशोखा के गुपनिहां(गुपनियाँ) रंग रे मलिया मन्जोषा जे लिखवे रे
होरे लिखवे-लिखवे रे मलिया रे मन्जोषा जे लिखवे रे
होरे धरतियो धरम के तिगुनियाँ (त्रिगुण) रंग रे मलिया मन्जोषा जे लिखवे रे
गुपनिहां में 5 कलर का मिनिग छिपा है

गु-गुलाबी
प-पिला
नि-नीला
ह-हरा
न-नारंगी
तिगुनियाँ अर्थात त्रिगुण
सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण
सतोगुण-नीला
रजोगुण-लाल या गुलाबी
तमोगुण-पिला
सतोगुण ब्रह्मा के प्रतीक है यह निर्माणकर्ता है यह ज्ञान का भंडार है।
रजोगुण-विष्णु को दर्शाता है यह पालनकर्ता है यह क्रम की प्रवृति देता है।
तमोगुण-शिव का प्रतीक है यह संहारकर्ता है सभी जीवों को मोह में डालता है।

इन्हीं तीन रंगों अथवा गुणों से समस्त सृष्टि का निर्माण हुआ है नीला और पिला के समिश्रण से हरा रंग बनता है जबकि लाल और पिला के मिलने से नारंगी रंग की चटक निखरती है। इन्हीं पांच रंगों से मंजूषा चित्र को सुसज्जित किया जाता है | नीले रंग से रेखा खिंचा जाता है और आंखे केश मूंछे बनाई जाती है एवं अन्य 4 रंग सुबिधा अनुसार से सजाया जाता है। मंजूषा चित्रकला पर जितनी भी चर्चा हुई उसके आधार पर यह कहना उचित होगा कि इस चित्र कला की विशाल परिधि में इतिहास, धर्म, परम्परा, कथापुरण, साहित्य,शिल्प,तकनीक,तन्त्र-मन्त्र सब कुछ से सराबोर लगभग सारी की सारी सांस्कृतिक चेष्टाएं आवद्ध है। कुल मिलाकर यह कहा जाता है कि मंजूषा चित्रकला प्रचीन आंगी लिपि का हीं विकसित स्वरूप है।

लेखक एवं मंजूषा पेंटर हेमंत कुमार के द्वारा बनाई हुई कुछ मंजूषा पेंटिंग

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लेखक : हेमंत कुमार, चम्पानगर, भागलपुर 

(लेखक एक मंझे हुए मंजूषा पेंटर है ) 

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