मगध सम्राट् बिम्बिसार की थाली में सजता था कभी अंग का कतरनी चावल

“मगध सम्राट् बिम्बिसार की थाली में सजता था कभी अंग का कतरनी चावल: गौतम बुद्ध ने भी चखा था चम्पा के चावल का स्वाद”

आज भागलपुर को भले ही ‘सिल्क सिटी’ के नाम से जाना जाता है, पर इसकी खास पहचान यहाँ के कतरनी चावल को लेकर है। छोटी-छोटी मोतियों के धवल दानों जैसे खुबसूरत, विशिष्ट गुणवत्ता से युक्त और अपनी मोहक सुगंध से बरबस अपनी ओर खिंच लेने का माद्दा रखनेवाला भागलपुर का कतरनी चावल न केवल आज स्थानीय लोगों के साथ देश-विदेश के लोगों का पसंदीदा ‘सौगात’ बना हुआ है, वरन् अंग जनपद के नाम से विख्यात रहे भागलपुर के इस विशिष्ट उत्पाद की प्राचीन काल में भी महत्ता थी, जिसका उल्लेख रामायण सहित बौद्ध ग्रथों व जातकों तथा ऐतिहासिक संदर्भों में मिलता है। प्रसिद्ध इतिहासकार एनएल डे ने 1918 में कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) से प्रकाशित बंगाल एशियाटिक सोसायटी के जर्नल में अपने अंग और इसकी राजधानी चम्पा विषयक लेख में भागलपुर के इस विशिष्ट उत्पाद का बड़ा ही रोचक वर्णन प्रस्तुत किया है।

‘रामायण’ एवं अन्य प्राचीन ग्रथों का संदर्भ लेते हुए इतिहासकार एनएल डे बताते हैं कि अंग और इसकी राजधानी चम्पा एक समृद्ध व्यापारिक नगरी के अलावे सदा से एक विशिष्ट चावल उत्पादक क्षेत्र के रूप में प्रसिद्ध रहा है। वे बताते हैं कि यहाँ एक खास प्रकार के चावल की खेती होती थी जिसकी खुशबू ऐसी थी कि इसे मगध सम्राट् बिम्बिसार के खाने की मेज के लिये संकलित किया जाता था जो उनकी थाली में सजता था। विदित हो कि एक समय में अंग एक शक्तिशाली राज्य था जिसके राजा ब्रह्मदत्त ने बिम्बिसार के पिता को पराजित किया था जिसका प्रतिशोध बिम्बिसार ने बाद में उसकी हत्या करके ली और तब से अंग मगध के अधीनस्थ हो गया।

बौद्ध गाथाओं में वर्णित है कि अंग जनपद में इस अनूठे चावल का उत्पादन अंग की राजधानी चम्पा के सोण नामक एक धनाढ्य संभ्रांत व्यक्ति के द्वारा किया जाता था, जो और कोई नहीं, ‘थेरगाथा’ का विख्यात लेखक सोण कोलविंश था। चीनी यात्री ह्वेन संग ने अपने यात्रा-विवरण में चम्पा के इस चावल उत्पादक का नाम श्रुतिविंशकोटि बताया है। इतिहासकार एनएल डे ‘अवदान कल्पलता’ नामक ग्रंथ के हवाले से बताते हैं कि सोण व श्रुतिविंशकोटि-दोनों एक ही व्यक्ति हैं। पालि भाषा में ‘सोण’ को ही ‘श्रोण’ कहा जाता है।

प्राचीन ग्रंथ बताते हैं कि अंग का यह कतरनी चावल सिर्फ राजा-महाराजाओं की थाली का ही शान ही नहीं था, वरन् महत्माओं-साधकों का पथ्य व आहार भी था। सम्राट् बिम्बिसार की ही तरह महात्मा बुद्ध को भी अंग का यह कतरनी चावल अत्यंत प्रिय था तथा उनके लिये भी यह यहाँ से संकलित किया जाता था। श्री डे बताते हैं कि जब भगवान बुद्ध अत्यंत रूग्ण हो गये थे, तो उनके प्रख्यात शिष्य मुदगलिपुत्र मोदगल्यायन स्वयं उनके पथ्य के लिये चावल लेने अंग आये थे। अंग के इतिहास की यह एक बहुत बडी बात है।

अंग के कतरनी चावल के साथ भगवान् बुद्ध का नाम सम्बद्ध होने के कारण बुद्ध के नाम पर कतरनी चावल का ‘ब्रांड’ तैयार कर भागलपुर के कहलगांव स्थित विक्रमशिला बौद्ध महाविहार के प्रति श्रद्धा रखनेवाले बौद्ध धर्मावलंबियों व बौद्ध देशों के बीच इसकी ‘मार्केटिंग’ को अंतराष्ट्रीय स्वरूप देखकर इसे एक नया आयाम दिया जा सकता है।

                                        

महात्मा बुद्ध जिनको भायी थी भागलपुर की कतरनी                                                     भागलपुर की कतरनी

________________________________________________________________________________________

लेखक : -शिव शंकर सिंह पारिजात (इतिहासकार),
अव. उप जनसम्पर्क निदेशक।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Cresta WhatsApp Chat
Send via WhatsApp
error: Content is protected !!