“योग” इसकी उत्पित्ति, इतिहास एवं विकास – डॉ. मोनालिसा (योग प्रशिक्षक)

योग एक बहुत सूक्ष्‍म विज्ञान पर आधारित एक आध्‍यात्मि विषय है जो मन एवं शरीर के बीच सामंजस्‍य स्‍थापित करने पर ध्‍यान देता है। यह स्‍वस्‍थ जीवन – यापन की कला एवं विज्ञान है। योग शब्‍द संस्‍कृत की युज धातु से बना है जिसका अर्थ जुड़ना या एकजुट होना या शामिल होना है। योग से जुड़े ग्रंथों के अनुसार योग करने से व्‍यक्ति की चेतना ब्रह्मांड की चेतना से जुड़ जाती है जो मन एवं शरीर, मानव एवं प्रकृति के बीच परिपूर्ण सामंजस्‍य का द्योतक है। आधुनिक वैज्ञानिकों के अनुसार ब्रह्मांड की हर चीज उसी परिमाण नभ की अभिव्‍यक्ति मात्र है। जो भी अस्तित्‍व की इस एकता को महसूस कर लेता है उसे योग में स्थित कहा जाता है और उसे योगी के रूप में पुकारा जाता है जिसने मुक्‍त अवस्‍था प्राप्‍त कर ली है जिसे मुक्ति, निर्वाण या मोक्ष कहा जाता है। इस प्रकार, योग का लक्ष्‍य आत्‍म-अनुभूति, सभी प्रकार के कष्‍टों से निजात पाना है जिससे मोक्ष की अवस्‍था या कैवल्‍य की अवस्‍था प्राप्‍त होती है। जीवन के हर क्षेत्र में आजादी के साथ जीवन – यापन करना, स्‍वास्‍थ्‍य एवं सामंजस्‍य योग करने के प्रमुख उद्देश्‍य होंगे। योग का अभिप्राय एक आंतरिक विज्ञान से भी है जिसमें कई तरह की विधियां शामिल होती हैं जिनके माध्‍यम से मानव इस एकता को साकार कर सकता है और अपनी नियति को अपने वश में कर सकता है। चूंकि योग को बड़े पैमाने पर सिंधु – सरस्‍वती घाटी सभ्‍यता, जिसका इतिहास 2700 ईसा पूर्व से है, के अमर सांस्‍कृतिक परिणाम के रूप में बड़े पैमाने पर माना जाता है, इसलिए इसने साबित किया है कि यह मानवता के भौतिक एवं आध्‍यात्मिक दोनों तरह के उत्‍थान को संभव बनाता है। बुनियादी मानवीय मूल्‍य योग साधना की पहचान हैं।

योग हमारे शरीर, मन, भावना एवं ऊर्जा के स्‍तर पर काम करता है। इसकी वजह से मोटेतौर पर योग को चार भागों में बांटा गया है : कर्मयोग, जहां हम अपने शरीर का उपयोग करते हैं; भक्तियोग, जहां हम अपनी भावनाओं का उपयोग करते हैं; ज्ञानयोग, जहां हम मन एवं बुद्धि का प्रयोग करते हैं और क्रियायोग, जहां हम अपनी ऊर्जा का उपयोग करते हैं।

हम योग साधना की जिस किसी पद्धति का उपयोग करें, वे इन श्रेणियों में से किसी एक श्रेणी या अधिक श्रेणियों के तहत आती हैं। हर व्‍यक्ति इन चार कारकों का एक अनोखा संयोग होता है। ”योग पर सभी प्राचीन टीकाओं में इस बात पर जोर दिया गया है कि किसी गुरू के मार्गदर्शन में काम करना आवश्‍यक है।” इसका कारण यह है कि गुरू चार मौलिक मार्गों का उपयुक्‍त संयोजन तैयार कर सकता है जो हर साधक के लिए आवश्‍यक होता है। योग शिक्षा : परंपरागत रूप से, परिवारों में ज्ञानी, अनुभवी एवं बुद्धिमान व्‍यक्तियों द्वारा (पश्चिम में कंवेंट में प्रदान की जानी वाली शिक्षा से इसकी तुलना की जा सकती है) और फिर आश्रमों में (जिसकी तुलना मठों से की जा सकती है) ऋषियों / मुनियों / आचार्यों द्वारा योग की शिक्षा प्रदान की जाती थी। दूसरी ओर, योग की शिक्षा का उद्देश्‍य व्‍यक्ति, अस्तित्‍व का ध्‍यान रखना है। ऐसा माना जाता है कि अच्‍छा, संतुलित, एकीकृत, सच पर चलने वाला, स्‍वच्‍छ, पारदर्शी व्‍यक्ति अपने लिए, परिवार, समाज, राष्‍ट्र, प्रकृति और पूरी मानवता के लिए अधिक उपयोगी होगा। योग की शिक्षा स्‍व की शिक्षा है। विभिन्‍न जीवंत परंपराओं तथा पाठों एवं विधियों में स्‍व के साथ काम करने के व्‍यौरों को रेखांकित किया गया है जो इस महत्‍वपूर्ण क्षेत्र में योगदान कर रहे हैं जिसे योग के नाम से जाना जाता है। योग की परंपरा अत्यंत प्राचीन है और इसकी उत्पत्ति सभ्यता के साथ ही हुयी है । योग विद्या मे शिव को आदि योग तथा आदि गुरु माना जाता है । शिव के बाद वैदिक ऋषि मुनियों से ही योग का प्रारम्भ माना जाता है । बाद में कृष्ण महावीर और बुद्ध ने इसे अपने तरह से विस्तार दिया । इसके पश्चात पतंजलि ने इसे सूबेवस्थित रुप दिया!महर्षि पतंजली ने योग को योग सूत्र नाम से योग सूत्रों का एक संकल्प लिया जिसमें उन्होंने अष्टांग योग का एक मार्ग बिस्तार से बताया है! अष्टांग योग को आठ अलग अलग चरणों वाला मार्ग बिस्तार से बताया है!

योग मे आठ अंग है जो इस प्रकार हैं…..

1) यम

2) नियम

3) असन

4) प्राणयाम

5) प्रन्याहार

6) धारणा

7) ध्यान

8) समाधी

आधुनिक काल में स्वामी विवेकानंद जी ने शिकागो के धर्म – संसद मे अपने ऐतिहासिक भाषण मे योग का उल्लेख कर सारे विश्व को को योग परिचित कराया । महर्षि महेश योगी, परमहंस योगानंद रमन महर्षि जैसे कई योगियों योगी, परमहंस योगानंद, रमन महर्षि जैसे कई योगियों ने पश्चिमी दुनिया को प्रभावित किया और धीरे धीरे योग एक धर्मनिरपेक्ष प्रक्रिया आधारित धार्मिक सिद्धांत के रूप में दुनिया भर में स्वीकार किया गया!वर्तमान समय में योगी रामदेव जी ने इसे विश्व स्तर पर लोकप्रिय बनायादिसम्बर 2014 को हमारे प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा मे 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा था जिसे 193 देशों में से 175 देशों ने बिना किसी मतदान के स्वीकार कर लिया सम्पूर्ण विश्व ने योग को महत्ता को स्वीकारते हुए माना कि योग मानव स्वास्थ्य व कल्याण की दिशा में एक सम्पूर्ण नजरिया है ।

आजकल पूरी दुनिया में योग साधना से लाखों व्‍यक्तियों को लाभ हो रहा है, जिसे प्राचीन काल से लेकर आजतक योग के महान आचार्यों द्वारा परिरक्षित किया गया है। योग साधना का हर दिन विकास हो रहा है तथा यह अधिक जीवंत होती जा रही है।  डॉ. मोनालिसा
बी.एस.ए. की सदस्य
योग प्रशिक्षक (समस्तीपुर)

(लेखिका डॉ. मोनालिसा ऑनलाइन और ऑफलाइन के माध्यम से योग की शिक्षा देती है)

 

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