मुसीबत से लड़ने के लिए प्रोत्साहित करने वाली मनोवैज्ञानिक : डॉ. दीप्ति प्रिया

मुसीबतें हमारी ज़िंदगी की एक सच्चाई है। कोई इस बात को समझ लेता है तो वहीँ दूसरा पूरी ज़िंदगी इसका रोना रोता है। ज़िंदगी के हर मोड़ पर हमारा सामना मुसीबतों से होता है। इसके बिना ज़िंदगी की कल्पना नहीं की जा सकती। अक्सर हमारे सामने मुसीबतें आती है तो हम उनके सामने पस्त हो जाते है। उस समय हमें कुछ समझ नहीं आता की क्या सही है और क्या गलत। हर व्यक्ति का परिस्थितियों को देखने का नज़रिया अलग-अलग होता है। कई बार हमारी ज़िंदगी में मुसीबतों का पहाड़ टूट पढ़ता है। उस कठिन समय में कुछ लोग टूट जाते हैं तो कुछ संभल जाते हैं। इस वक़्त हम एक ऐसे इंसान या सहारा ढूंढते हैं जो हमारा उचित मार्गदर्शन करते हुए परेशानी से निकलने का रास्ता दिखाए। ऐसे ही किसी भी मुसीबत से लड़ने के लिए मनोवैज्ञानिक डॉ. दीप्ति प्रिया प्रोत्साहित करते हुए इंसान का हौसला बढ़ाती हैं जिससे इंसान फिर से नयी खुशहाल ज़िंदगी को जी सके।

डॉ. दीप्ति प्रिया का गृह जिला मधुबनी (बिहार) है। इनके पिता डॉ. श्रीदेवदास बिहार सरकार की सेवा से सेवानिवृत्त डॉक्टर हैं और इनकी माँ डॉ. सुनीला दास सी.एम. साइंस कॉलेज से सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं। डॉ. दीप्ति अपने पति और बेटी के साथ बंगलुरु में रहती हैंऔर एक सफल मनोवैज्ञानिक के रूप में काम कर रही हैंऔर हाल के वर्षों में वो लेखनी के माध्यम से अध्यात्म और मनोविज्ञान के विषय में लोगों तक जानकारी देने और जागरूक करने का प्रयास कर रही हैं। डॉ. दीप्ति की प्रारम्भिक स्कूली शिक्षा दरभंगा से पूरी हुई फिर बारहवीं और स्नातक की पढ़ाई रांची विश्वविद्यालय से, स्नातकोत्तर की पढ़ाई बंगलुरु विश्वविद्यालय से फिर आगे पी.एच.डी. मदर टेरेसा महिला विश्वविद्यालय कोडाइकनाल से पूरी की।

डॉ. दीप्ति स्नातक की पढ़ाई में कॉलेज की टॉपर रही है, बंगलुरु विश्वविद्यालय के अपने कैंपस के मनोविज्ञान विभाग में स्नातकोत्तर की पढ़ाई के लिए कर्नाटक के बाहर से आये छात्रों के लिए सिर्फ एक ही सीट होता है और बड़ी संख्या में आने वाले आवेदनों की वजह से दाखिला लेना बेहद मुश्किल होता है लेकिन अपने स्नातक के अच्छे शैक्षणिक परिणाम के कारण डॉ. दीप्ति चयनित हो पायी। पढ़ाई के तुरंत बाद इनको प्रतिष्ठित संस्थान ‘राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल-विकास संस्थान’, बेंगलुरु में मनोवैज्ञानिक के तौर पर काम करने का मौका भी मिल गया । पी.एच.डी. के लिए चयनित होने पर डॉ. दीप्ति नौकरी से त्याग देकर अध्ययन और अनुसंधान के कार्य में लग गई। पीएचडी के दौरान इन्होंने दो पुस्तकें भी लिखी।

डॉ. दीप्ति की रुचि 11th क्लास से लेकर पी.एच.डी. तक की पढाई में मनोविज्ञान ही रहा इस वजह से इनका मुख्य विषय भी मनोविज्ञान रहा है। ‘राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान’, बेंगलुरु में मनोवैज्ञानिक के तौर पर काम करते हुए डॉ. दीप्ति को काफी अनुभव हुआ और कई मनोवैज्ञानिक कठिनाइयों से जूझते लोगों की मदद करने का मौका मिला। डॉ. दीप्ति को ऐसे भी बहुत लोग मिले जो सतह पर सफल प्रतीत होते हैं पर अन्तः में खालीपन होता है और भावनात्मक स्तर पर कई कठिनाइयों का सामना कर रहे होते हैं। कई ऐसे भी लोग होते हैं जिन्हें अपनी भावनात्मक कठिनाइयों के बारे में बात करने में झिझक होती है और बात कर भी लें तो शर्मिंदगी की क्यूँ अपनी जिंदगी किसी के सामने रख दी। मनोवैज्ञानिक के रूप में काम करने के साथ-साथ डॉ. दीप्ति अपने शोध कार्य को जारी रखी, आध्यात्मिक विचार और मनोविज्ञान में समन्वय पर इन्होंने लिखना शुरू किया, इनका उद्देश्य था गहरे भावनात्मक चुनौतियों को समझना और उसे जड़ से खत्म करना। डॉ. दीप्ति का कहना है की मेरा ऐसा विश्वास है कि, लेखनी के माध्यम से एक ही समय में बहुत सारे लोगों की मदद कर पाऊंगी, और खासकर ऐसे लोगों की मदद कर पाऊंगी जो सचमुच स्वयं को बेहतर करना चाहते हैं। ऐसे विचारों का विस्तार कर पाऊंगी जो हमारे जड़ रूप को समझने के लिए सहायक बने और जहाँ जरूरत हो बदलने में भी।” डॉ. दीप्ति अपने कार्य में सफलता के लिए प्रेरणास्त्रोत जीवन, खुशियाँ और मुस्कुराहट को मानती हैं।

डॉ. दीप्ति एक मनोवैज्ञानिक के तौर पर मुख्यतः बच्चों के संतुलित विकास के लिए काम कर रही हैं। डॉ. दीप्ति मनोचिकित्सा के सिद्धांतों और एनर्जी-हीलिंग का समन्वय करके थेरेपी करती है। यह विधि बहुत प्रभावशाली होता है। डॉ. दीप्ति का कहना है की अनुभव के साथ ऐसा मैंने देखा कि, पैरेंटिंग के मिथकों का उन्मूलन करके, विकास के मूल विचारों को सशक्त करने से ही मनोवैज्ञानिकचुनौतियाँ कम होंगी। अपने आचरण का संतुलित निरीक्षण कर पाने की सक्षमता को विकसित करने से ही यह संभव है। मेरे काम का यही मुख्य आधार है। हर बच्चे के सीखने की अपनी एक शैली होती है, उसे समझने और अपनाने से ही बच्चों को पूर्ण विकास में मदद मिलती है। मनोवैज्ञानिक मनोचिकत्सा के कुछ विशेष तकनीक, उपयोगी अभ्यास और एकाग्रता के प्रशिक्षण से बच्चों के सीखने की कठिनाइयों को प्रबंधित करना मेरे कार्य क्षेत्र का हिस्सा है।” 

डॉ. दीप्ति को लिखने का शौक बचपन से था। मनोविज्ञान का विषय इन्होंने अपनी मर्जी से चुना, इस क्षेत्र में काम करके इनको यह दिखा कि प्रायः मनोवैज्ञानिक चुनौतियों का मूल कारण बाल-मन पर लगे घाव होते हैं। कई पैरेंट्स के लिए यह समझना आसान नहीं है कि बच्चों में स्वस्थ परिवर्तन लाने के लिए स्वयं में बदलाव लाना जरूरी होता है। डॉ. दीप्ति आगे बताती हैंकी आपका विज़न, आपकी आस्था, विश्वास, धारणा से जुड़े होते हैं। यह विजन आपके अपने अनुभव से बनती है तभी वह आपकी अपनी होती है, उसे सिर्फ आप ही बेहतर समझ सकते हैं, जरूरी नहीं है कि परिवार या कोई और इस विज़न को समझ पाए, इससे जुड़ पाए। इसीलिए कई बातों के लिए परिवार वालों पर गर्व है और कई जगहों पर दृढ़ता से अपने उद्देश्य के लिए खड़ा भी होना पड़ता है। अगर आपके लिए कुछ बातें अस्वीकार्य है तो इसके लिए संकल्प और दृढ़ता जरूरी है।

अभी हाल में ही डॉ. दीप्ति की पुस्तक “विमोह” प्रकाशित हुई है। “विमोह” अज्ञानता, भ्रम आदि के कारण उत्पन्न होने वाला वह मोह है जो मनुष्य को ‘स्व’ के शाश्वत स्वरूप से दूर कर देता है।पुस्तक “विमोह” उत्कृष्ट साहित्य का प्रतिरूप है जो विचारों के उत्थान और सकारात्मक भावनाओं के साथ विचारों के निर्माण के लिए एक उत्तम प्रयास है। जहाँ महाभारत के पात्रों व प्रसंगों को प्रतीकात्मक रूप में समझने के लिए कविता के माध्यम से विवरणात्मक चर्चा है।कवयित्री डॉ. दीप्ति से विमोह की कविताओं पर चर्चा करने पर यह विचार जागृत होता है कि हमारा जीवन वैसा ही है, जैसा की हम उसे अपने अंतः में बनाते हैं। गूढ़ अर्थों में समझने से यह भी विचार आता है कि प्रायः हर संघर्ष विमोह की नासमझी से ही उत्पन्न होता है और इसकी शाश्वत समझ हमें बेहतर जीवन की और ले जाती है। पुस्तक “विमोह” पाठकों को सशक्त करते हुए उन्हें अंतर्ध्वनि की ओर आकर्षित कराती है और आध्यात्मिक स्तर की वृद्धि का आधार बनने में सक्षम है। “विमोह” की कविताओं में पात्रों, दृश्यों का अलंकृत और विस्तृत विवरण परिपक्वता के साथ दिखता है, काव्यात्मक शैली और सभी कविताएं अतुल्य हैं।

डॉ. दीप्ति द्वारा लिखित पुस्तक ‘विमोह’ को पढ़ कर लोगों की अपेक्षा इनसे जुड़ रहीं हैं, बहुत से विद्वानों की समीक्षा और टिप्पणियां भी इनको मिली हैं। इन सब से इस बात की पुष्टि होती है कि डॉ. दीप्ति ने जिन विचारों को सामने रखने की कोशिश की है, उसे लोग सराह रहे हैं। प्रोत्साहन के साथ विशिष्ट शिक्षाविदों से काव्यपुस्तक ‘विमोह’ पर समीक्षा भी मिली है। कुछ शब्दशः आंशिक समीक्षा साझा किया जा रहा है।

डॉ दीप्ति प्रियाके आठ कविताओं का संग्रहविमोहअध्यात्म प्रधान भारतीय संस्कृति का संवाहक है, भावात्मक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण का संग्राहकहै।श्रीमद्भगवद् गीता के पात्रों की भावनाओं को मनोवैज्ञानिक ढंग से ऐसा चित्रित किया गया है कि साम्प्रतिक व्यक्ति अपनी स्थिति/मनोदशा ही उसे समझ कर सही निर्णय लेने की शक्ति पा सके, आत्मतत्व के ज्ञान और भक्ति ला सके।

प्रो० शशिनाथ झा, कुलपति, कामेश्वरसिंहदरभंगासंस्कृतविश्वविद्यालय

विमोहकीकविताओं को पढ़कर मानव मन सहज ही उद्वेलित हो उठता है और अपने अतीत में घटित घटनाओं से अपने आप का सम्बन्ध की तरह अनुभूत कर उठता है।मैं कवयित्री डॉ दीप्ति प्रिया को साधुवाद प्रदान करना चाहूंगा कि इसी तरह अपने अंतस्तल में प्रस्फुटित मनोगत भावों को अपनी लेखनी के माध्यम से काव्य जगत को समृद्धि प्रदान करें। आशा है कि वे आगे कुछ और श्रेष्य रचनाओं के द्वारा मानव-मन को संतृप्त करने में सहायिका होंगी। 

डॉ चन्द्रकान्त शुक्ल, रांची विश्वविद्यालय संस्कृत विभाग के पूर्व प्रमुख, विशिष्ट योगदान और सेवाओं के लिए  2013 में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित.

एक मनोवैज्ञानिक के तौर पर डॉ. दीप्ति अपनी उपलब्धि यही मानती हैंकि बहुत सारे लोग जो भावनात्मक चुनौतियों से जूझते हैं, उनमें से कुछ लोगों तक पहुँचकर उनके जीवन में मुस्कराहट वापस ला पा रही हैं। आगे डॉ. दीप्ति का कहना हैकि पढ़ने सुनने में यह बहुत आम लग सकता है। वह इसलिए कि जिस तरह की पीड़ा लोगों को होती है, विशेषकर वह जो छोटी उम्र में दुर्व्यवहार के शिकार हो जाते हैं यह अकल्पनीय है। ऐसी पीड़ा के साथ भावनात्मक कठिनाइयों से जूझने वाले लोगों के अंदर आत्मविश्वास और मुस्कराहट को आते हुए देखना ही मेरी सफलता है। 

डॉ. दीप्ति को यात्रा करना और संगीत सुनना बेहद पसंद है। प्रकृति में समय व्यतीत करना जैसे किसी झरने के पास बैठना, या समुंदर की लहरों संग खेलना, सूर्योदय और सूर्यास्त को देखना (इनकी कोशिश इन्हें हर दिन देखने की होती है)। यह सभी डॉ. दीप्ति अपने जीवन में उत्साह लाने वाली मानती हैं। डॉ. दीप्ति मनोचिकित्सक और लेखिका के तौर पर अपनी यात्रा की शुरूआत कर चुकी हैं और एक लम्बा रास्ता तय करना अपना लक्ष्य बनाई हुई हैं। उनको उम्मीद है कि वो लोगों के विचारों में सन्तुलित बदलाव ला सकेंगी, मुख्यतः पैरेंटिंग में कई बदलाव करने के लिए कार्य करना चाहती हैं जिससे बच्चों के मनोभाव पे सकारात्मक प्रभाव पड़े।

डॉ. दीप्ति आगे कहती है की किसी भी देश, राज्य, समाज को बेहतर करने के लिए बच्चों पर विशेषतः ध्यान देने की जरूरत है। उन्हें सशक्त करने की जरूरत है। उन्हें स्कूल कॉलेज की शिक्षा के साथ-साथ यह शिक्षा देनी भी जरूरी है कि वह अपने व्यवहार का सन्तुलित निरीक्षण कर पाएं, अपने विचारों को खुद बनायें। यह तभी संभव हो पायेगा जब पैरेंट्स और बड़े जिन्हें बच्चे अपना आदर्श मानते हैं वे स्वयं अपने आचरणों से परिचित होंगे। जाने अनजाने, हम अपने आचरणों के पद चिन्हों को अपने बच्चों पर अंकित कर देते हैं। अपने आचरण का संतुलित निरीक्षण कर पाने की सक्षमता को विकसित करनेसे ही मानसिक तौर पर स्वस्थ समाज, राज्य, देश बनेगा। जब तक ऐसा नहीं होता है, किसी न किसी शक्ल में हमारा मन भावनात्मक रूप से जूझता ही रहेगा, या फिर आश्रित रहेगा। बदलाव लाने के लिए स्वस्थ व सन्तुलित पैरेंटिंग की जरूरत है।

डॉ. दीप्ति से बात करने पर उन्होंने इस पर जोर दिया की मानसिक रूप में दुर्व्यवहार हर जगह देखने को मिलता है, परंतु इन दुर्व्यवहारों पर कभी व्यापक चर्चा नहीं होती है। विशेष तौर पर स्त्री द्वेषी मानसिकता के कारण दुर्व्यवहार तो प्राय: हर घर में पाया जाता है। शोध कहता है कि लगभग 80% महिलाएं घरेलू शोषण का शिकार होती हैं। मुद्दा यह है कि ज्यादातर महिलाओं ने इसके बारे में कभी किसी से बात नहीं की। कई महिलाएं तो जानती भी नहीं की वे घरेलू शोषण की शिकार हैं। उदाहरण के तौर पर उन्होंने अपने एक केस के बारे में भी जिक्र किया। एक दंपति परामर्श के लिए मेरे पास आये, पति की शिकायत थी की पत्नी बेहद चिड़चिड़ी हैं। बच्चों और उनकी माँ के साथ रूखा बर्ताव करती हैं। पत्नी का कहना था की, हर किसी की जरूरत मेहनत और लगन से पूरा करती हूँ, फिर भी हर दिन अनेकों बार अपने पति से, परिवार वालों से ताने सुनती हूँ, कभी-कभी मजाक के नाम पर बाहर वालों से भी, अब तो मैं अपने दोनों बच्चों से भी ताना सुनने लगी हूँ। यह अब मेरे लिए स्वीकार्य नहीं है। मैंने अपने पति, सास,अपनी माँ सबसे बात करने की कोशिश की, परइनसबों को लगता है कि दोष मेरा ही है। पति का कहना था की, मेरे पास नौकरी करने की जिम्मेदारी है, मैं कड़ी मेहनत करता हूँ, मेरा काम बहुत महत्वपूर्ण और लगन का है, मुझे अपनी पत्नी की परवाह है, लेकिन जब भी मैं घर पर होता हूं तो कुछ न कुछ ऐसा मुद्दा सामने आता है जिस पर वह बहस करने लगती है, और पूरा माहौल तनाव पूर्ण बन जाता है। सोच से परे, पत्नी की खिन्नता पति के हर रोज के तानों की वजह से थी, और स्त्री की ओर उनका खुद का दुर्व्यवहार उन्हें या तो दिखा नहीं या फिर सही लगा।

एक स्त्री-द्वेषी मानसिकता वाला पति हमेशा आसपास होने वाली किसी भी चूक के लिए अपनी पत्नी को दोषी ठहराता है। वे मानसिक रूप से महिलाओं को प्रताड़ित करते हैं। अपनी कमियों, खिन्नता, निराशा, नकारात्मकता, विफलता, अवरोध इत्यादि के लिए दोष कथित तौर पर कमजोरों पर लगाने की कोशिश करते हैं, घर में पत्नियों पर या घर के किसी और सदस्य पर। समझने की बात यह है कि, पुरुष जो महिलाओं का सम्मान करना नहीं जानते वह जाने अनजाने मेंआमतौर पर अपने आस पास ऐसे ही तनाव उत्पन्न करते हैं पर दोष हमेशा महिलाओं पर ही डालते हैं।अनजाने ही, पर अपने बच्चों में भी मनोवैज्ञानिक विकार को प्रस्फुटित कर देते हैं।यह सब अकारण है। ऐसी स्थिति में रहने वाली और आश्रित महिला समय के साथ पूरी तरह परतन्त्रता की शिकार हो जाती हैं, और धीरे-धीरे वह भी माँ या सास के रूप में स्त्री-द्वेषी मानसिकता का विस्तार करने लगती हैं। खुद भी दूसरी महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार करने लगती हैं और हर किसी बात के लिए उन पर दोषारोपण करने लगती हैं। इन सबों का सीधा असर बच्चों की परवरिश पर पड़ता है। मेरी उम्मीद अपनी लेखनी के माध्यम से ऐसे विकारों को पर ध्यान लाने की है। ऐसे विचारों के विस्तार की है जिससे मनोवैज्ञानिक कठिनाइयों में कमी आये, महिलाएं और पुरुष दोनों ही सशक्त बनें, इससे ही हमारी अगली पीढ़ी भी वास्तविक रूप में सशक्त बन पाएगी।

द्रौपदी द्रव्य नहीं, सृष्टि है

उसका न्याय ही होगा धर्म।।विमोह’, पृ०३७.

अक्षरशः इन पंक्तियों को समझेंतो, हम सबों को मिल कर ऐसी प्रथाओं और मानसिकता का त्याग करना होगा जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध है। अन्यथा हम विमोह की अज्ञानता से कभी बाहर नहीं आ पाएंगे। अगर मनोवैज्ञानिक स्तर पर देखें तो एक स्वस्थ और प्रसन्न माँ अपने बच्चे को मनोवैज्ञानिक तौर पर ज्यादा स्वस्थ, शशक्त और सक्षम बनाने की बुनियाद रख पाती हैं।

डॉ. दीप्ति अपनी अगली पुस्तक में, आत्म-विश्लेषण, विश्वास, सम्मान इत्यादि को संतुलित रूप से विकसित करने के विषय पर काम कर रही हैंऔर उनको उम्मीद है कि विचार से समृद्ध साहित्य के साथ-साथ उनकी लेखनी पाठकों के लिए रोचक बन पाएंगी। उनको उम्मीद यह भी है कि, बिहार के लोग उनके काम को देखेंगे, पढ़ेंगे, आचरणों के विमोह को ध्वस्त करते हुए अपना मार्ग प्रशस्त करेंगे और भावनात्मक स्तर पर सशक्त हो पाएंगे।

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