आज फिर मानवता शर्मसार हुई…. अर्चना सिंह

आज फिर मानवता शर्मसार हुई,
आज फिर ईश्वर फूट -फूट कर रोया,
क्यूँ उसने इंसा में दरिंदो को बसाया,
कल एक निर्भया हमने खोई,
अभी उसकी चिता की आग ठंडी भी ना हुई,
और आज फिर एक निर्भया हाथरस में नग्न हुई,
क्या सोचा ,तुमने मर्दानगी दिखाई,
वस्त्र विहीन जब तुमने स्त्री बनाई,
बलात्कार कर ज़िंदा उसे जलाते हो,
और सीना ठोक ख़ुद को मर्द बताते हो,
अरे तुम इंसान तो बन ना पाए,
मर्द क्या ख़ाक बनोगे,
लोगों का क्या है,
बस ले मोमबत्ती हाथ में ,
निकल पड़ेंगे सड़क पे,
क्या मिलेगा इससे निर्भया को इंसाफ़,
ऐ वहशी मत भूल तू उसी कोख़ से जन्मा है,
मत भूल हद पर आएगी नारी,
तो यही नारी बन जाएगी काली,
ये कोरोना तो बस एक बहाना था,
ईश्वर को तो बस सबको डराना था,
फिर भी तू ना माना,
अब देख बस जब नटराज ख़ुद नाचेगा,
तेरे कारण नारी बनेगी चण्डी दुर्गा काली,
फिर एक बार उठायेगी शास्त्र,
फिर करेगी क़लम सिर को तेरे,
फिर कभी ना हो पाएगी ,
कोई भी निर्भया निःवस्त्र……

लेखिका : अर्चना सिंह (पटना)

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