हाँ मुझे स्वाभिमान है…..कि मैं भारतीय हुँ…. “दामिनी”

मुझे स्वाभिमान है कि मैं भारतीय हुँ।
अनन्त की सीमा पर कवच बन कर खड़ी हिमालय हुँ।
मंदाकिनी के वेग को सामार्थ्य बन कर रोकती,
गंगोत्री के बहाव में आचमन मैं ढुंढती,
संगम की धारा से लिपटती परमार्थ हुँ,
मुझे स्वाभिमान है कि मैं भारतीय हुँ।

शिवाजी की कहानियों में माँ जीजा की कृतार्थ हुँ,
महाराणा की रोटियों में घास का अभिप्राय हुँ,
लक्ष्मी की तलवारों में ढुंढती मैं परवरिश;
हिंद की माताओं के आगे नतमस्तक मैं आज हुँ,
मुझे स्वाभिमान है कि मैं भारतीय हुँ।

हनुमान के पाठ में तय सुर्य से दूरी,
गणेश के सिर में हाथी का प्रवास हुँ,
चरक की किताबों में आर्युवेद का तेज,
अर्जुन के गांडिव में कृष्ण का लेख हुँ।

दक्षिण के मंदिरों के शिल्प में लिपटी,
केदार के बर्फ में शिव की दास हुँ,
काशी की गलियों में मुक्ति मैं ढुंढती,
गंगा के घाट पर आरती की थाल हुँ,
मुझे स्वाभिमान है कि मैं भारतीय हुँ।

त्रेता की सेतु में पत्थर मैं ढुंढती,
कलयुग की डोर को राम से जोड़ती,
सीता के वन में सीख कर्तव्यों की भाषा,
निषाद संग गुरुकुल में पढ़ती मैं वीर हुँ,
मुझे गर्व है कि मैं भारतीय हुँ।

आज विह्वल जब दुनिया संकट में चिंतन,
प्रकृति का क्रोध संभालती मैं विनती हुँ,
जब संकट मानवता पर छाई है आज,
दवाइयां बना दुनिया तक पहुँचाती,
संसार में उम्मीद की इकलौती मैं रीढ़ हुँ।

कह लो तुम मुझे संस्कृति की धारा,
अतीत के गौरव की गीत मैं गाती,
अध्यात्म की नींव पर निर्मित विज्ञान हुँ,
हाँ थाम मैं हृदय में चिंतन तुम्हारा,
कहती हुँ आज; तुम भी कहो,
मुझे स्वाभिमान है कि मैं भारतीय हुँ
हाँ मुझे स्वाभिमान है…..कि मैं भारतीय हुँ।

लेखिका
दामिनी नारायण सिंह
(गृह जिला : राजगीर / वर्तमान में रांची )

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