“कुछ इस तरह झूम के सावन आया है…..” – सम्पन्नता बरुन

बदलते ॠतुओं की पहल हुई है |
सौंधी सी हवाओं की सहर हुई है |
बरसते बूँदों ने धरती को सजाया है |
कुछ इस तरह झूम के सावन आया है |

देख ज़रा इन बदमस्त फिज़ाओं में,
कोयलिया ने रस घोला है |
खिलते हुए फूलों ने भँवरों के लिए,
अपने रस का दामन खोला है |
बेख़ौफ़ सा हो के सन्नाटों में शोर मचाने को दिल आया है |
कुछ इस तरह झूम के सावन आया है |

नील गगन के काले बादल |
सतरंगी रंगों का आँचल |
हर कोने को पावन करने |
सूखे को यूँ सागर करने |
मन की सूनी धरती में एक नया सवेरा छाया है |
कुछ इस तरह झूम के सावन आया है |

झूम उठे किसान खुशी से,
चूम रहे खलिहानो को |
हरियाली ने दामन अपना,
हँस-हँस कर फैलाया है |
कुछ इस तरह झूम के सावन आया है |

एक बिरहन की वो आशा की नीभ,
इस सावन मे पिया आएंगे |
ना आए तुम, तो बैरी बरसात मे भीग जाएंगे |
तुम्हारी यादों को सजाएंगे |
प्रेम भरा मेरा मन, उस एहसास को मैने दिल में दफ़नाया है |
आज फिर तुम्हारे बिना झूम के सावन आया है |

सुर छेङ रहे हैं मन के तार,
हे प्रभु तेरा दिल से आभार |
बनी रहे यूँ कृपा तेरी,
लावण्य रहे यूँ धरा मेरी |
इंद्रधनुषी आसमान ने, अमृत वर्षा बरसाया है|
कुछ इस तरह झूम के सावन आया है |
झूम के सावन आया है |

 

कवयित्री
सम्पन्नता बरुन, पटना
गायिका/कत्थक नृत्यांगणा/लेखिका

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