उदयाचल से अस्ताचल की ओर बढ़ती देखो वनिता की धारा – अंशु प्रियदर्शनी

उदयाचल से अस्ताचल की ओर बढ़ती देखो वनिता की धारा,
निकली जब भी घर से वो लेकर कुछ अभिलाषा,

समाज के बंधन ने मोड़ दिया उसकी अभिलाषा की धारा,
होती पग- पग पर अपमानित लेकर एक कुंठा को

अरे ! क्या हुआ अगर वो लड़की है जो बना दी उसकी ऐसी दशा,
उदयाचल से अस्ताचल की ओर बढ़ती देखो वनिता की धारा,

माँ बनकर दिया जन्म, दिया धरती पर आने का मौका,
क्या उसने कोई भूल की थी जो बचाकर रख दिया अस्तित्व जरा सा,

चलि जब भी सड़को पे वो कदम से कदम मिलाकर,
ना मिला उसे बदनामी के अलावा कुछ भी जो कर सके पूरी इक्षा उसकी,

उदयाचल से अस्ताचल की ओर बढ़ती देखो वनिता की धारा,
मार दी जाती है वो अपनो से , होने से पहले पैदा,

कोई कैसे ठुकरा जाता है ऐसा अनमोल तोहफा,
अभी ऐसा है आने वाला वक्त किसने है देखा,

बढ़ाते रह जाओगे हाथ पर छू ना पाओगे इसकी छाया,
उदयाचल से अस्ताचल की ओर बढ़ती देखो वनिता की धारा !!

 

लेखिका
अंशु प्रियदर्शनी,
युवा फैशन प्रबंधक एवं विज़ुअल मर्चेंडाइज़र दिल्ली में कार्यरत है
(गृह जिला – मुजफ्फरपुर)

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