प्रकृति के क़रीब लाने का प्रयास करता है वन महोत्सव – सुजाता प्रसाद

हर साल भारत सरकार जुलाई के प्रथम सप्ताह में सम्पूर्ण देश में विस्तृत तरीके से वन महोत्सव का आयोजन करती है। वन महोत्सव प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने की कोशिश और जागरूकता बनाए रखने का प्रयोजन है। हमारे यहां पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक एवं राष्ट्रीय उत्सव मनाने की परंपरा रही है। वन महोत्सव को हम मानवता के उत्सव के रूप में मनाते हैं। क्योंकि अपने फ़ायदे के लिए मानवीय कृत्यों द्वारा की गई ग़ुस्ताखियों से पेड़ पौधों की संख्या लगातार घटती चली गई। हमारा पर्यावरण ख़तरों से घिर गया जिसका कुप्रभाव मनुष्यों को भुगतना पड़ रहा है। वन महोत्सव हमें प्रकृति के क़रीब लाने का प्रयास करता है ताकि हम जागरूक हो सकें। अपनी धरती को हरा-भरा करने की दिशा में कार्य कर सकें। पेड़ पौधे हमारे लिए कितने कल्याणकारी हैं यह जान सकें। ये पेड़ पौधे पृथ्वी के सभी जीव जंतुओं के लिए सच्चे मित्र से कम नहीं हैं यह मान सकें। मानसून में आई बारिश के पानी को रोकने में पेड़ पौधे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आए हैं। इनकी जड़ों में मिट्टी को बांधे रखने की क्षमता होती है और मिट्टी में पानी संचित करने की क्षमता होती है। ये मृदा क्षरण रोकते हैं। ये रेगिस्तानों को बनने और उसके विस्तार को रोकते हैं इसके अलावा ये पेड़ पौधे धरती पर वर्षा लाने का कारक भी बनते हैं। जिस तरह जलचक्र की प्रक्रिया में सूर्य किरणें विभिन्न जल स्रोतों जैसे सरवर, नदी, सागर से जलकणों को अवशोषित कर वर्षा का कारण बना करती हैं, वही कार्य यह पेड़-पौधे भी किया करते हैं। पेड़-पौधे वर्षा का कारण बन कर विषैली गैसों का अवशोषण करके पर्यावरण की रक्षा करते हैं।

मानसून में पौधों की बहुतायत होती है। पौधों के नर्सरी भी विभिन्न प्रजातियों के पौधों से भरे पूरे होते हैं।  मानसून के आगमन के बाद बीते हफ़्ते “वन महोत्सव सप्ताह” 1 जुलाई से 7 जुलाई तक मनाया गया। जगह-जगह वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित किए गए। लेकिन यह सोचना भी जरूरी है कि इनमें से कितने पौधे, पेड़ बन पाते हैं? यानी इनके विकसित होने की प्रक्रिया हो भी पाती है या नहीं। मानसून की बारिश तक तो प्राकृतिक रूप से इन पौधों में सींचन हो जाता है लेकिन उसके बाद हर जगह इनकी देखभाल हो पाती है या नहीं? वृक्षारोपण कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए इसकी निगरानी भी बहुत आवश्यक है। ऐसे में नवरोपण के लाभ से हम वंचित रह जाते हैं और वृक्षारोपण कार्यक्रम महज़ एक औपचारिकता भर रह जाता है। क्योंकि अधिकांश पौधे रोपण के बाद जल के अभाव में सूख जाते हैं। अक्सर उनके चारों ओर सुरक्षा घेरा नहीं बना होने के कारण वे शाकाहारी पशु के भोजन का ग्रास बन जाते हैं। पृथ्वी की हरीतिमा महज़ कुछ कार्यक्रमों और सिर्फ कागज़ों तक सीमित रह जाती है।

इसलिए जब तक वृक्षों का संरक्षण नहीं हो पाएगा तो इसके संवर्धन की कल्पना कैसे की जा सकती है? वन विभाग और विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी क्षेत्र विशेष के लिए उस क्षेत्र का एक तिहाई हिस्सा वृक्षों से आच्छादित होना चाहिए, तभी उसे पेड़ पौधों की दृष्टि से आदर्श क्षेत्र का दर्जा मिल पाता है। इसके लिए शहर शहर सड़कों और नदियों के किनारे क़दम क़दम पर वृक्ष लगाना कितना सुंदर और लाभदायक प्रयास होगा, यह समझने की जरूरत है। साथ ही घने वन की संकल्पना करना और उसे सुचारू रूप से क्रियान्वित करना अत्यंत विचारणीय है। क्योंकि वनस्पतियों के संरक्षण से हमारा ही संरक्षण होगा। जंतु जीव जगत का अस्तित्व पादप जीव जगत के अस्तित्व से ही तो जुड़ा है। पौधे हमसे कार्बन-डाई-ऑक्साइड लेते हैं और प्राण वायु ऑक्सीजन के रूप में हमें अमृत देते हैं। हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक विषैले गैस कार्बन डाइऑक्साइड का शोषण करते हैं। इतना ही नहीं पर्यावरण में उपस्थित अन्य घातक गैसों का पोषण भी करते हैं। कल-कारखानों से उठते धुएं और अन्य विषैली गैसें पर्यावरण में फैल जाते हैं । पेड़-पौधे उन विषैली गैसों को तो वायुमण्डल और वातावरण में घुलने से रोक कर पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाया करते हैं। साथ ही कल कारखानों से उठे धूल, राख और रेत आदि के कणों को भी ऊपर जाने से रोकते हैं। सच है कि हमारा जीवन अपने आप में कोई अलग अस्तित्व नहीं है। हम सभी इस प्रकृति के अनन्य हिस्से हैं। क्योंकि जो सांस हम छोड़ते हैं उसे पेड़ अपने अंदर लेते हैं; जो पेड़ बाहर छोड़ते हैं उसे हम अंदर लेते हैं। स्पष्ट है कि श्वास नि:श्वास की प्रक्रिया सिर्फ हमारे फेफड़ों से ही संचालित नहीं हो रही है, इसमें पेड़ पौधे भी अपने फेफड़ों के साथ तालमेल बिठाते हैं, तभी श्वसन की क्रिया संपन्न होती है।

वृक्षों की कटाई के कारण परिणाम स्वरूप बदले में हमें बाढ़, सूखा, प्रदूषण का सामना करना पड़ रहा है। धरती के तापमान में वृद्धि हो रही है, पहाड़ों पर बरफ पिघलने लगे हैं। बाढ़ और सूखे की विषम स्थितियों से हमें जूझना पड़ रहा है। नदियों का जल दूषित हो रहा है, वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड गैस की मात्रा बढ़ रही है, पर्याप्त वनों के अभाव में हमें प्रदूषित वायु में साँस लेना पड़ रहा है। इसके दुष्परिणामों से जीव जंतुओं का प्राकृतिक आवास विकास की भेंट चढ़ चुका है। कृषि के लायक भूमि का विस्तार वनों की कटाई की कीमत पर उपलब्ध होने लगा। औद्योगिक विकास और जनसंख्या वृद्धि के कारण पर्यावरण की समस्या गंभीर और गंभीर होती गई। अगर हम “जल ही जीवन” कहते हैं तो इस कथन का अंतर संबंध वृक्षों से भी है। क्योंकि पेड़ पौधों से बारिश का पानी मिलता है, इस पानी से अन्न उपजाए जाते हैं, जो हमारे जीवन की अनिवार्य आवश्यकता हैं, इसलिए वृक्ष भी जीवन का ही प्रतीक हैं। भारत जैसे देश में वनस्पतियों के महत्व को हमेशा से उच्च स्थान दिया गया है। जागरूक वर्ग हमेशा अपना सहयोग देते रहे हैं। इनकी उपयोगिता को जन जन के मन में स्थापित करने के लिए पेड़ों को पूजने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। आयुर्वेद के अनुसार वनस्पतियों से बने औषधियों से मानव तन को स्वस्थ एवं दीर्घायु किया जा सकता है और ऐसा हो भी रहा है।

इसलिए विकास के दौर में हमारी आवश्यकताओं के अनुरूप ही वृक्षों की कटाई के नियम बनाया जाएं। साथ-साथ हमारा भी यह कर्त्तव्य बनता है कि अधिकांश तौर पर सूखे वृक्ष ही काटे जाएं और एक कटे पेड़ के बदले दो पेड़ लगाए जाएँ और उनकी उचित देखभाल भी व्यवस्था हो। आज जब पूरी दुनिया कोरोना वायरस से उपजी कोविड19 जैसी महामारी से त्रस्त है तो प्रकृति शांत और वातावरण स्वच्छ है। प्रदूषण का स्तर कम हुआ है, नदियां साफ़ हुईं हैं। शीतल मन्द हवा चल रही है और मानसून के आते ही अच्छी बारिश हो रही है। प्रत्यक्ष रूप से कोरोना मानव-जीवन के लिए एक अभिशाप जरूर है, पर परोक्ष रूप से प्रकृति के लिए यह एक वरदान से कम नहीं है। जिसका अनुभव हम सभी को हो रहा है। प्रकृति का यह मौन संदेश है कि अब मनुष्य को प्राकृतिक-संसाधनों और अपनी जरूरतों के बीच संतुलन बना कर जीवन जीने की कला सीख लेने में ही भलाई है। मनुष्य विकास की राह पर आगे और आगे बढ़ते रहने के लिए आंखें मूंद कर पेड़ों की अन्धाधुंध कटाई पर ज़ोर दे रहा है। पर्वतों पर पेड़ पौधों की कटाई पर्वतीय क्षेत्रों को विरान बना रही है। प्रदूषण का ग्राफ बढ़ता जा रहा है और जीवन की रफ़्तार घटती जा रही। ख़तरे में पड़ी मानवता की सुरक्षा के लिए क्या प्रकृति का इतना इशारा काफ़ी नहीं है कि हम अपने जीव मंडल को बचाएं। हमें पेड़-पौधों की रक्षा और उनके नवरोपण आदि की ओर प्राथमिक स्तर पर ध्यान देना चाहिए। यदि हम चाहते हैं कि धरती हरी-भरी रहे, नदियाँ अमृत जल धारा बहाती रहें और सबसे बढ़कर मानवता की रक्षा संभव हो सके, तो हमें पेड़-पौधे उगाने, उन्हें संवर्धित और संरक्षित करने की पहल जरुर करना चाहिए।

लेखिका
सुजाता प्रसाद
निवास स्थान : नई दिल्ली (पैतृक निवास : पटना )

शिक्षा : स्नातकोत्तर हिंदी, स्नातक विज्ञान प्रतिष्ठा, शिक्षा विशारद विज्ञान, डी.सी. एच.(डिप्लोमा इन क्रिएटिव राइटिंग) एवं अन्य।
संप्रति : शिक्षिका (सनराइज एकेडमी), स्वतंत्र रचनाकार, मोटिवेशनल वक्ता।
रूचिः
रचना-सृजन, स्वतंत्र-लेखन एवं साहित्य पठन-पाठन में संलग्न, काव्य गोष्ठियों तथा सम्मेलनों में भागीदारी, सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में समयानुसार सक्रिय।

उपलब्धिः
काव्य संग्रह “अनुभूतियों की काव्यांजलि”कौटिल्य पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित। पुस्तकलिंक http://www.amazon.in/gp/product/9387809765/ref=cm_sw_r_tw_myi?m=ALN5G791ICL96
कई स्वतंत्र एवं साझा संकलन प्रकाशित। राष्ट्रीय समाचार पत्रों, विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में और लोकप्रिय वेबसाइट्स पर रचनाओं का प्रकाशन आदि।

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