कहाँ गया वो अपनापन…… ऋचा चौबे

अपनापन…..

कहाँ गया वो अपनापन,
‌जो सबके प्यार में हुआ करती थी,
हर सुख-दुःख आपस मे बटता था,
हसीं ठिठोली होती थी।

‌क्यूँ…..
‌आज हमसब दूर हो रहे हैं,
अपनो से मुँह मोड़ रहे हैं
वक़्त के जाल में यूँ उलझ गए,
की ख़ुद से ख़ुद को छुपा रहे हैं….

एक बार……
इंसानियत जगाओ ना
छोड़ के अपने स्वार्थ को
एक दोस्ती का हाथ बढ़ाओ ना
तोड़ के अपने जिस्म की चाह
‌सच्चा प्यार दिखलाओ ना

‌अब….
‌ये भीड़ में जो तन्हाई हैं
‌शोहरत की मची लड़ाई हैं
‌धोखे ने आग लगाई हैं
‌सपना जो सबने सजाई हैं

‌करते हैं…
‌तन्हाई में रंग को भरते हैं
‌सच्चाई का दम्भ रखते हैं
‌ईमान को पाक करते हैं
‌हर सपने को सच देखते हैं।

कवयित्री – ऋचा चौबे, पटना 

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