“खबर अच्छी थी…”- सुरेंद्र नाथ

खबर अच्छी थी
लोग बदल रहे थे
उनकी जीवन पद्धतियाँ बदल रही थीं
बदलने लगा था उनका
स्वभाव, उनका संस्कार
उनका रहन- सहन, उनका ख्वाब
और उनके दैनिक क्रियाकलापों के साथ -साथ
मानवीय जीवन का इतिहास

उन्हे सिखाया जा रहा था
जीने का ढंग
बिना दवा – दारु और शल्य – क्रिया कराये
मौत से फतह करने का तरीका
और पुनः पुरानी पद्धतियों को अपनाकर
चिरायु बने रहने की
जुनूनी कसरतें

लोग महीनो से घरों में कैद थे
खुली हवा से परहेज कर
पूर्णतः गुमस रहे थे
मगर आश्चर्य
कभी रत्ती- भर कुलबुलाते नही थे
शायद जीने का हुनर जो सीख रहे थे!

मै पिछले दो माह से देखते आ रहा हूँ
सुबह होते ही छत पर आम सिलसिला शुरु हो जाता है
कोई मूँद लेता है आँखें
कोई कान में डाल लेता है ऊँगली
कोई करने लगता है अनुलोम-विलोम
और सूर्य नमस्कार
कोई आजमाने लगता है आयुर्वेदिक उपचार
कोई पड जाते हैं होम्योपैथिक चमत्कार के फेर में
कोई खोजने लगता है गिलोय
कोई अजवायन,हल्दी, सौंफ
और काला नमक

कहते हैं , बदलने का यह सिलसिला ऐसा चला
कि कल तक परिजनो का पैर छूकर प्रणाम करनेवाला
नमस्कार पर उतर आया
बेटा खुद मा- बाप को
दूर से हीं ‘ टा – टा ‘, ‘ बाय- बाय’ करने लगा
छोड दिया
अपने हीं मा – बाप के अंतिम संस्कारों में भाग लेने की
सदियो पुरानी प्रचलित रिवाजें
बूढा बाप कब तक संजोया करता
जवान बेटी ब्याहने का सपने पालना
नवविवाहिता भी एक नहीं सुननेवाली
अड गई जिद्द पर
सुहागरात का सेज त्यागकर
बेचारे अतिथि कभी चाहकर भी नही फटकते
और रोते-विलखते माता- पिता आहें भरकर रह जाता है
प़वासी बेटे-बेटियों का देखकर
फेश-बुक पर फोटो

मै खुद परेशान हूँ यह सब देखकर
गिरगिट की भाँति मनुष्य क्षण -क्षण रंग बदलने लगा है
ऐसी कौन-सी प्रवृर्तियाँ विकसित हो गई हैं उनमें
न कुछ छूता है, न कुछ सूंघता है
कोई कुछ देता भी है दिल खोलकर
तो ग़हण करने के पहले सौ बार सोचता है
अब तो नोटों की गद्दी पर सोनेवाला भी
रिश्वत नही लेता
छोड दिया सारा बांकी -बंकियौता और उधार
वापस लेना
जैसे चंचला लक्ष्मी को तिरस्कृत कर जताना चाहता हो
कि उनकी कृपा के बगैर भी जिया जा सकता है
मर्यादित जीवन!

मेरी चिंता यह है कि
कल होकर लोग पेट और जीभ को साध लेगा
सूघना छोड देगा
नाक और मुंह को बंद कर
छीकने पर भी बिजय प्राप्त कर लेगा
लेकिनशुद्ध हवा के बिना
एक पल भी जीवित कैसे रह सकेगा

मगर लोगों की जिद्द है
बदलते जा रहे हैं
उसे गुमान है अपने आत्मबल पर
और कोसने लगे हैं मुंझे
मेरे वर्षो के किये-कराये तमाम चमत्कारिक अनुसंधानों
डाक्टरी प्रावधानों
एवं बिश्वास से लवरेज हुए सियासी आश्वासनो पर

मै देख रहा हूँ
कभी किसी के भरोस पर जीनेवालों को आज
हनुमान बल का एहसास होने लगा है
कभी गाडी से जमीन पर पैर नही उतारनेवाला
दो,-दो हजार किलोमीटर पैदल चलने लगा है
अंधो को हो गई हैं आँखें
लंगडे-लूल्हे को आत्मिक बलो वाला पैर
और गर्भवती मा
रास्ते मे जन्म लिये नवजात को आँचल मे छुपायी
चल पडी है हजारो किलोमीटर की दूरी मापने
तपती- पिघलती हुई , पीच सडक पर

मै सोचता हू
किसी के भरोसे बैठकर समय गंवाने के बदले
दुनिया आत्मबल पर जीना सीख लिया होता
तो जीवन कबका खुशहाल हो गया होता
घुट- घुटकर मरने की समस्या तो समाप्त हो ही जाती
बार- बार लोगो को इस कदर बदलना भी नही होता

लेखक
सुरेंद्र नाथ
पूर्व संयुक्त रजिस्ट्रार – सहकारिता विभाग, बिहार सरकार
कोषाध्यक्ष – भारतीय लेखक मंच
मैथली लेखक संघ में कार्यरत

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