गांव चलता है तो शहर गतिमान होता है…. सुजाता प्रसाद

गांव चलता है तो शहर गतिमान होता है, क्योंकि आधारभूत जरूरतों की पूर्ति यहीं से होती है और फिर विकास का दर्पण शहर बनता है। कोविड के पूर्व गांव के युवाओं की एक बड़ी खेप शहरों की ओर आती थी, और पूरी संभावना भी है कि कोविड के बाद भी यह सिलसिला थमेगा नहीं। क्योंकि पलायन करने वाले युवाओं की संख्या ज्यादा है इसलिए उन्हें वहां भी फिर से रोज़गार की समस्या का सामना करना ही पड़ेगा।

परंतु ऐसा भी हो सकता है कि स्वावलंबन को अपना साथी बनाने वाले युवा वहीं अपनी प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन कर आत्मनिर्भर बन सकते हैं। जैसे कृषि क्षेत्र में अपने हुनर को आज़मा सकते हैं, लघु एवं कुटीर उद्योगों की तरफ मुड़ सकते हैं। हालांकि बिना सरकारी सहायता और कम पूंजी में कुछ बहुत अच्छा कर पाना मुश्किल है, लेकिन आत्मविश्वासी युवा इस ओर अग्रसर हो भी सकता है। पैदल कूच कर जाने वालों का अदम्य साहस उन्हें आत्मनिर्भर भी बना सकता है। पर कोरोना वायरस के संक्रमण के फैलने की स्थिति में प्रवासी मजदूरों के पलायन का सैलाब एक अलग कहानी रचने की तैयारी में भी दिख रहा है, ऐसी संभावना दीखती है। हां, इस रिवर्स माइग्रेशन की वजह से आशंका जरूर बनी हुई है कि अब वहां से उनका आना फिलहाल मुमकिन नहीं है। बेशक यह कुप्रभाव कोविड-19 के कारण हुआ है लेकिन अनलॉक वन के बाद महानगरों में इनकी कमी शिद्दत से महसूस की जाएगी, की भी जा रही है, ऐसा जानकारों ने कहा था और वैसा ही हो रहा है। अनलॉक टू की शुरुआत में मजदूरों का हूजूम तो नहीं, उनकी इक्का-दुक्का टोली ही देखी गई।

अभी तो कोरोना वायरस के संक्रमण का ख़तरा टला नहीं है, ऐसे में मजदूरों की वापसी का कोई मतलब ही नहीं बनता है, लेकिन क्या सब ठीक हो जाने के बाद पहले जैसा हो जाएगा यही सबसे बड़ा सवाल है। सवालों की छोड़ें तो इतनी मुसीबतों का सामना करके अपने अपने घरों को पहुंचे ये तमाम प्रवासी मज़दूर क्या फिर आने का ज़हमत उठाएंगे। ऐसे में तो और जब राज्य सरकार उनके लिए काम मुहैया करवा रही हों। आर्थिक रूप से मार खा रहे मेहनतकश मजदूर जब शहरों, महानगरों को छोड़ कर जा रहे थे तब वे मानसिक रूप से भी टूट गए थे। चाहे कोरोना वायरस का कहर हो या महानगरों का बेगानापन, शायद ही वे उस कठिन समय को भूल पाएं। तस्वीर तो यही कहती है कि रोटी के कारण महानगरों की ओर प्रस्थान करने वाले मजदूर महामारी से उपजे व्याप्त भय के कारण अपने गांव कस्बों को लौट चुके हैं।

तकरीबन 8.2 करोड़ से भी अधिक प्रवासी मजदूरों की पुनः वापसी नहीं होने की स्थिति में देश की अर्थव्यवस्था अपने प्रश्न लेकर खड़ी हो जाएगी। खेतों में काम शुरू होने पर इनकी कमी खलेगी, क्योंकि ज़्यादातर श्रमिक अपने अपने घरों को लौट चुके हैं। जिसका सीधा असर अनाज की पैदावार पर पड़ेगा और किसानों को इस स्थिति को एक चुनौती के तौर पर स्वीकारना होगा। शहरों में कृषि क्षेत्र में मजदूरों की अनुपस्थिति का बुरा प्रभाव पड़ रहा है, परिणाम स्वरूप मुंहमांगी कीमत देकर किसान अपने खेतों में काम करवा रहे हैं। निर्माण कार्य जगह जगह स्थगित हुए पड़े हैं। गगनचुंबी इमारतों की नींव तो पड़ गई है पर इसे उस ऊंचाई तक पहुंचाने वाले हाथ रुठ के चले गए हैं। अपने सहायक निर्माताओं की बाट जोह रहे अर्धनिर्मित भवन, कल कारखाने, बाजार इत्यादि को आपदा के हत्थे चढ़े श्रमिक कामगारों का इंतजार है और रहेगा।

अफ़सोस! शहरों महानगरों की उन्नति में अपने श्रम का योगदान देने वालों मेहनतकश श्रमिकों के लिए वहां उनके दिल में कोई जगह नहीं मिली। ऐसे में हमारी जिम्मेदारी बनती है कि न सिर्फ़ उन्हें बुलाने के लिए नई क़वायद शुरू की जाए बल्कि उनकी सुरक्षा की गारंटी दी जाए और विषम परिस्थितियों में उनके संरक्षण की व्यवस्था भी की जाए। कुछ दिनों पहले जिसका आगाज़ अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी ने अपने विडियो मैसेज के द्वारा कर दिया है, जिसमें उन्होंने कहा है- “देश के सभी मजदूर भाइयों और बहनों को ये बताना चाहती हूं कि आपको दिल्ली एनसीआर में रोजगार दिलाने के लिए आइ ए एस ऑफिसर अभिषेक सिंह जी ने आई आई टी और आई आई एम के छात्रों के साथ मिलकर सिगमा एकत्र हेल्प लाइन नंबर पर हेल्पलाइन शुरू किया है। आप सभी लोग इस हेल्पलाइन नंबर पर फोन या व्हाट्स ऐप कर सकते हैं। अपने आप को रजिस्टर कर सकते हैं और अपनी मनपसंद नौकरी पा सकते हैं। हेल्पलाइन का नंबर है 8800883323. और हां, ये सेवा जो है पूरी तरह से निशुल्क है। इस मैसेज को सभी जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाएं। अपना और अपने परिवार का ध्यान रखें, सुरक्षित रहें। धन्यवाद।” श्रमिकों के हित के लिए की गई यह एक अच्छी पहल है।

लेखिका : सुजाता प्रसाद

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