जिन्दगी प्यासी ही थी पर समन्दर भर गई….. डाॅ. उमा पिथौरा

बादलों ने भी बूंदों को इक हिफाजत से था कब तक समेटा?
जब लगने लगी वो बोझ उसको
देखो ना किस बेदर्दी से ला धरती पे फेंका।।।
भूला था शायद बूंदों ने ही तो था उसे मेघ बनाया ।।
आज धरती को तृप्ति दे के
वापस वाष्प बनके
बादलों का घर फिर से सजाया।।
अंतर्मुखी बूदों ने कब कहीं घर को था बदला?
जल चक्र के तहत जन्मों जन्मों से
मेघों को ही पकडा।
माँ (धरती) के थे संस्कार की
जब जब गोद में आई
कर दिया वापस अपने घर जाओ
फिर फिर मेघों ने दी तन्हाई ।।
बादल और बूंदों की तकरार हो के रह गई ।।
जिन्दगी प्यासी ही थी पर समन्दर भर गई ।।
लोग क्या जाने समन्दर खारे कैसे हो गये?
हमने तो शक्कर ही घोली थी।।
आँसू मय बन कर बह गए ।।।

स्वरचित
डाॅ. उमा पिथौरा

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