“चाह मुस्कराहट की”… मानसी प्रज्ञा

“चाह मुस्कराहट की”

“मैं ” पौधे में पनप रही, एक नन्ही कली थी ;
ओस की बूंदों सी चमक रही थी..।।
खूबसूरत फूल बनने मैं चली थी ;
आकाश में गरजते बादल देख मचल रही थी.. पतझड़ के मौसम में,
तेज़ हवा के झोंकों से लड़ रही थी ; फिर पौधे से जुदा हो, सिसक रही थी.. ।।

“क्या मैं मुस्कुराते जँच नहीं रही थी ..?”

अभी पुराने जख्मों से उभर ही रहीं थी ;
मुस्कुराने के लिए तरस रही थी.. ।।
फिसलन थी, पर अभी फिसली नहीं थी ;
खुद़ को हौसला दिए, कुछ नए सपनें लिए चहक रही थी..।।
ना जाने क्यों? मुसाफिरों के लगाए इलज़ामों से बहक रही थी;
ना चाहते हुए भी, मंजिलों से भटक रही थी ..।।

” क्या मैं मुस्कुराते जँच नहीं रही थी…?”

 

लेखिका
मानसी प्रज्ञा
पूर्व पर्यावरण सचिव – पटना विमेंस कॉलेज
कोर सदस्य, छात्र संचालित संगठन “हमारा बिहार”

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