2500 वर्ष पुराना है पटना का चित्रगुप्त मंदिर

श्री चित्रगुप्त मंदिर पटना के पूर्वी भाग के दीवान मुहल्ला, नौजर घाट पर गंगा के सुरम्य तट पर स्थित है। मंदिर के बगल में ही सूफी संत नौजर शाह का मकबरा भी है जिसकी वजह से इस घाट को नौजर घाट (चित्रगुप्त) के नाम से जाना जाता है। गंगा का यह घाट प्रागैतिहासिक है। विभिन्न रामायणों में उपलब्ध वर्णनों के आधार पर यह कहाजाता है कि भगवान राम अपने अनुज लक्ष्मण एवं महर्षि विश्वामित्रके साथ बक्सर में ताड़का वध करने के बाद राजा जनक के द्वारा भेजे गए स्वयंवर के आमंत्रण पर जब जनकपुर की ओर चले तो गंगा के दक्षिण तट के किनारे चलते-चलते पाटलिपुत्र आए और इसी ऐतिहासिक घाट से नाव द्वारा गंगा पार कर जनकपुरी की ओर बढ़े। श्री राम ने नौजर घाट से गंगा पार कर चित्रसेनपुर नामक गांव में पैर रखा था। बाद के वर्षों में गंगा पार कर भगवान बुद्ध ने भी इसी ऐतिहासिक घाट से पाटलिपुत्र में प्रवेश किया और बोधगया में जाकर संबोधि प्राप्त की तथा पाटलिपुत्र को ही केन्द्र बनाकर पूरे विश्व में बौद्ध दर्शन का प्रचार-प्रसार किया। इसी ऐतिहासिक घाट पर यम द्वितीया के दिन भगवान चित्रगुप्त की सामूहिक पूजा की परम्परा मुद्राराक्षस ने प्रारम्भ की थी। ईसा के 400 वर्ष पूर्व मगध की राजधानी पाटलिपुत्र पर नंद वंश का शासन था जिसके महामात्यशटक दास ऊर्फ शटकारि थे, जो बाद में मुद्राराक्षस के नाम से लोकप्रिय हुए। इस प्रकार नौजरघाट (चित्रगुप्त घाट) पर भगवान चित्रगुप्त की सामूहिक पूजा की प्रथा 2500 वर्ष पुरानी है, जो इस पवित्र स्थान को विश्व के प्राचीनतम धार्मिक स्थलों की सूची में लाकर खड़ा करता है।कहा जाता है कि चाणक्य की बहुर्चिचत ऐतिहासिक पर्णकुटी (कुशघास के तिनकों से बनाई झोपड़ी) भी इसी घाट पर थी। मुद्राराक्षस ने ही भारत वर्ष के कायस्थों का पाटलिपुत्र के नौैजर घाट पर प्रथम विराट जातीय सम्मेलन बुलाया था। मंदिर परिसर में अनेक देवी-देवताओं की गुप्तकालीन मूर्तियां एवं मंदिर के अवशेष विद्यमान हैं। इस स्थान का विशेषमहत्व इसलिए भी है कि यहां से गंगा दक्षिण वाहिनी होती है।सन् 1573 में यम द्वितीया के दिन ही सम्राट अकबर (1556-1605 ) के नवरत्नों में प्रमुख वजीरे-ए-खजानाराजा टोडरमल ने जनकपुर से दिल्ली लौटने के क्रम में श्री चित्रगुप्त भगवान की यहां पर पूजा-अर्चना की थी। इस ऐतिहासिक स्थान की दुर्दशा देखकर वे इतने मर्माहत हुए कि इसी स्थान परचित्रगुप्त भगवान के एक भव्य मंदिर के निर्माण का संकल्प लिया। दिल्ली लौटकर एक वर्ष बाद इसी दिन उन्होंने अपने नायाब कुंवर किशोर बहादुर के नेतृत्व में मंदिर को एक भव्य स्वरूप प्रदान कराया। सन् 1574 की यम द्वितीया के दिन पुन: पाटलिपुत्र आकर राजा टोडरमल ने भगवान चित्रगुप्त की काली कसौटी पत्थर की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा की और मंदिर का विधिवत उद्घाटन किया। 1766 में महाराजा सिताबराय ने इस मंदिर के आसपास जमीन मंदिर को उपलब्ध कराया और महाराजा भूप नारायण सिंह ने इसको वर्तमान स्वरूप प्रदान किया। यह मंदिर स्थापत्य कला का अद्भुत प्रतीक है चार-चार की कतारों में बने इसके मंडप की छत 16 स्तंभों पर टिकी है। इसके सबसे ऊपरी भाग पिरामिड कीआकृति का है। गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा के लिए बड़ा वर्गाकार प्रदक्षिणा पथ है। 50 साल पहले इस मंदिर के काले पत्थर की चित्रगुप्त की दुर्लभ प्रतिमा चोरी हो गई थी लेकिन संयोग देखिए ! वर्षों बाद दस नवम्बर 2007 में हाजीपुर के चित्रसेन गांव में मिट्टी खोदते समय भगवान चित्रगुप्त की 433 वर्षपुरानी दुर्लभ प्रतिमा मिली। यह अति दुर्लभ मूर्ति भारत वर्ष कीयह अकेली चित्रगुप्त भगवान की मूर्ति है। श्री आदि चित्रगुप्त की प्रतिमा कोमंदिर में पुन: स्थापित करने का मुख्य श्रेय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को जाता है। बहरहाल, इस मंदिर को एक प्राचीन ऐतिहासिक एवं धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करनेका प्रयास जारी है।

सुबोध कुमार नंदन

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