यकीन पे खरी उतरूं या दुनिया पे कँरू यकीन…… डाॅ. उमा पिथौरा

यकीन पे खरी उतरूं
या दुनिया पे कँरू यकीन
पर वजह भी तो हो
और वजह वो सच भी हो।।

शाम आती है हर एक को इल्म है
तूफान का किसी को इन्तजार नही होता
पर यदि शाम ही एक तूफान बन जाए
बेबसी है कि साथ तो गुजरना ही होगा।।

सब्र रखा कि सुबह कभी तो होगी
पर सुबह लानी भी हमे थी ये कब किसने बताया?
और हमने फिजूल दिन दिन किया था जाया।।

इंसान को पता हो कि हर खुशी वो खुद ही है
चाहे तो खुद मिल ले वो खुशी खुद की ही से
कोई क्या देगा अगर लेना ही ना आए
खुशी हो के ददॅ बस आँसू ही बहे जाँए।।

आँसू भी जब सुख दुख को एक सा ही समझे
दोनो मे बराबर नयनों से वो ढलके
दिन रात भी तो एक से ही हैं गर कोई ये समझे
उजाला अगर रौशन करे धरती को वो सँवारे
चाँदनी भी तो पावन करे और रूप निखारे

फिर क्यो हमे डरा जाते हैं
पल भर के अँधेरे
ये ददॅ न तेरे वे ना कभी मेरे
हमने तो बस जीना था इक ये जीवन
ले आयेंगे खुशियाँ भी हम भूल के कृन्दन।।

खुशियाँ बेशुमार हैं हर एक आँगन मे
पहचाने ना कोई गर देखे वो दपॅण
कुछ है क्या कुछ जो कि तुम मे नही है?
अनुपम कृति हो तुम कोई मोल नही है।।

पहचान लो कि अब भी हुई देर नही है
बफॅ की है दीवार अभी लौह नही है
स्निग्ध स्नेह से उष्मा की तृप्ति है वांछित
बफॅ जल मे हो परिणत और ह्दय तृप्त सुवासित ।।

दीवारों का गिरना भी हो जाए एक रस्म
ह्दय से मिले ह्दय और सब गिले हों भस्म ।।

स्वरचित
डाॅ. उमा पिथौरा

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