सारा कुछ बिल्कुल वैसा ही मिला.. जैसा कि था मेरा – डाॅ. उमा पिथौरा

आत्म स्पन्दन सा वो स्पषॅ।।
वो अनकही सी अनुभूतियाँ।।
मौन मे लिपटा सा वो दंश।।
कब फिसल गया हाथों से।।
और मानस पटल मुखरित हो उठा।।
कई सारी अनकही बातों से।।

बात बस इतनी सी थी।।
की एक सा ही था सबेरा।।
सारा कुछ बिल्कुल वैसा ही मिला।।
जैसा कि था मेरा।।

हर शाम ढलती थी ।।
ओढ़कर एक सपना।।
सोचो तो कुछ भी नहीं।।
पर लगने लगा था सिर्फ अपना।।

व्यथाओं, व्याकुलताओं का वो शूल।।
वो दंश।।
जब फिसल गया हाथों से।।
और मानस पटल पुनः।।
मुखरित हो उठा बातों ही बातों से।।

स्वप्न टूटने का भय तो था।।
पर स्वप्न टूटेगा।।
ये भी तो तय ही था।।

चोटें लगती थीं।।
तो भी ददॅ तो अपना ही था।।बाकी माँगी हुई खुशियाँ।।
महज इक सपना ही तो था।।

इसलिए स्वयं को स्वयं की।।
परिधि मे ही समेटना बेहतर।।
और जिन्दगी को विराम दे।।
उन–
अनकही बातों।।
अनबुने सपनों।।
उन शूलों।।
उन दंशों।।
को दिल मे ही दफन कर।।
उन अंतिम मयस्सर धागों से लिपट कर।।
बयां कर खुद मे ही रो लेना बेहतर।।

क्योंकि इस भरी दुनिया से।।
अंततः
वही धागे साथ जाएँगे ।।
और फिर कभी
किसी के पल
या साथ माँगने
हम लौट कर
कभी वापस नहीं आएगे।।

 

स्वरचित
डाॅ. उमा पिथौरा

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