अगर महावीर मंदिर पटना की पहचान है, तो नैवेद्यम महावीर मंदिर की। घी, बेसन, केसर और मेवे से बने प्रसाद ‘नैवेद्यम’ का स्वाद जिसने एक बार लिया, उसे वह ताउम्र याद रखता है। नैवेद्यम और महावीर मंदिर का साथ 25 साल का हो चुका है।

ऐसे बनता है आपका नैवेद्यम

सबसे पहले शुद्ध बेसन से बुंदिया तैयार की जाती है। इसके बाद चीनी की चासनी में डालकर उसे मिलाया जाता है। मिलाने के क्रम में ही बुंदिया के साथ-साथ काजू, किशमिश, इलाइची और केसर मिलाया जाता है। चासनी में बुंदिया का मिश्रण लगभग दो घटे तक होता है। इसके बाद मिश्रण को लड्ड् बाधने वाले प्लेटफॉर्म पर रख दिया जाता है। यहा पर एक साथ 15 से 20 कारीगर खड़े होकर लड्डू बाधते हैं। यहा बैठकर लड्डू बनाने की परंपरा नहीं है। लड्डू बाधने के बाद उसे 250 ग्राम, 500 ग्राम और एक किलो के पैकेट में रखा जाता है। फिर उसे महावीर मंदिर भेज दिया जाता है।

कर्नाटक की देसी गायों के घी से होता है निर्माण

आचार्य किशोर कुणाल का कहना है कि शुरू में महावीर मंदिर में नैवेद्यम पटना डेयरी प्रोजेक्ट के घी से तैयार किया जाता था, लेकिन तिरुपति जैसा स्वाद नहीं आ पाता था। इसके बाद पता किया गया कि आखिर तिरुपति के नैवेद्यम का स्वाद इतना अच्छा क्यों होता है तो पता चला कि वहा पर कर्नाटक की देसी गायों के घी से इसे तैयार किया जाता है। इसके बाद महावीर मंदिर न्यास समिति ने कर्नाटक मिल्क फेडरेशन से सपर्क किया। तब से वहा पर नदनी के नाम से कर्नाटक मिल्क फेडरेशन से घी ले कर प्रसाद तैयार किया जाने लगा।

बिक्री में हुए लाभ से कैंसर मरीजों को मिलता अनुदान

महावीर मंदिर द्वारा नैवेद्यम की बिक्री करने से जो लाभ प्राप्त होता है, उससे महावीर कैंसर सस्थान में इलाज कराने वाले गरीब मरीजों की आर्थिक मदद की जाती है। कैंसर के गरीब मरीजों को मदिर की ओर से 10 से 15 हजार रुपये की मदद की जाती है। 18 वर्ष से कम उम्र के सभी मरीजों को 15,000 रुपये अनुदान दिया जाता है। इसके अलावा सभी मरीजों को मुफ्त में भोजन कराया जाता है। प्रतिदिन लगभग 1500 लोग भोजन करते हैं। मरीजों के परिजनों को भी अनुदानित दर पर भोजन दिया जाता है। कैंसर मरीजों को मात्र 100 रुपये प्रति यूनिट खून मुहैया कराया जाता है।

10 फीसद राशि मिलती है कारीगरों को

महावीर मंदिर न्यास समिति नैवेद्यम की कुल बिक्री की दस फीसद राशि प्रसाद बनाने वाले कारीगरों को देती है। यही कारण है कि तिरुपति से आकर कारीगर पटना में काम करने को तैयार हैं। अब तो कारीगरों की दूसरी पीढ़ी भी काम करने आने लगी है।

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