मां मुंडेश्वरी देवी का धाम, कैमूर जहां बलि देने की प्रथा का तरीका बिल्कुल अनोखा हैं।

बिहार के कैमूर जिले में स्थित मां मुंडेश्वरी देवी का धाम जहां बलि देने की प्रथा का तरीका बिल्कुल अनोखा हैं। दरअसल यहां सात्विक तरह से बलि दी जाती है। यहां बलि तो दी जाती है, लेकिन उसका जीव का जीवन नहीं लिया जाता। जिला मुख्यालय से करीब 11 किलोमीटर दूर पंवरा पहाड़ी पर स्थित मुंडेश्वरी मंदिर में भक्त अपनी मनोकामना लेकर आते हैं। मान्यता है कि मां मुंडेश्वरी सच्चे मन से मांगी मनोकामना जरूर पूरी करती हैं। वैसे यहां बकरे के बलि की प्रथा अवश्य है, लेकिन यहां किसी के जीवन का अंत नहीं किया जाता। माता के चरणों में बकरे को समर्पित कर पुजारी अक्षत-पुष्प डालते हैं और उसका संकल्प करवा दिया जाता है। इसके बाद उसे भक्त को ही वापस दे दिया जाता है। मुंडेश्वरीधाम की महिमा वैष्णो देवी और ज्वाला देवी जैसी मानी जाती है। काफी प्राचीन माने जाने वाले इस मंदिर के निर्माण काल की जानकारी यहां लगे शिलालेखों से पता चलती है। इतिहासकारों की मानें तो मंदिर परिसर में मिले शिलालेखों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण 635-636 ईस्वी के बीच का हुआ था। मुंडेश्वरी के इस अष्टकोणीय मंदिर का निर्माण महराजा उदय सेन के शासनकाल का माना जाता है। यहां मां मुंडेश्वरी की प्रतिमा वाराही देवी की प्रतिमा के रूप में है, क्योंकि इनका वाहन महिष है। इस मंदिर का मुख्य द्वार दक्षिण दिशा की ओर है। 608 फीट ऊंची पहाड़ी पर बसे इस मंदिर के विषय में मंदिर परिसर में पाए गए कुछ शिलालेख ब्राह्मी लिपि में हैं, जबकि गुप्त शासनकाल में पाणिनी के प्रभाव के कारण संस्कृत का प्रयोग किया जाता था। यहां 1900 वर्षों से पूजन होता चला आ रहा है। मंदिर का अष्टाकार गर्भगृह आज तक कायम है। गर्भगृह के कोने में देवी की मूर्ति है जबकि बीच में चर्तुमुखी शिवलिंग स्थापित है.मां मुंडेश्वरी देवी का धाम

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