वृहद्विष्णुपुराण के मिथिला-माहात्म्य में मिथिला एवं तीरभुक्ति दोनों नाम कहे गये हैं। मिथि के नाम से मिथिला तथा अनेक नदियों के तीर पर स्थित होने से तीरों में भोग (नदी तीरों से पोषित) होने से तीरभुक्ति नाम माने गये हैं। इस ग्रंथ में गंगा से लेकर हिमालय के बीच स्थित मिथिला में मुख्य 15 नदियों की स्थिति मानी गयी है तथा उनके नाम भी गिनाये गये हैं।

मिथिला का माहात्म्य बतलाते हुए वृहद्विष्णु पुराण के मिथिला-माहात्म्य खंड में कहा गया है कि गंगा से हिमालय के बीच 15 नदियों से युक्त परम पवित्र तीरभुक्ति (तिरहुत) है। यह तीरभुक्ति मिथिला सीता का निमिकानन है, ज्ञान का क्षेत्र है और कृपा का पीठ है। जानकी कि यह जन्मभूमि मिथिला निष्पापा और निरपेक्षा है। यह राम को आनंद देने वाली तथा मंगलदायिनी है। प्रयाग आदि तीर्थ लोकों में पुण्य देने वाली है परंतु राम की प्राप्ति करवाने में समर्थ नहीं है; परंतु यह मिथिला सब प्रकार से निश्चित रूप से राम को तुष्ट करने वाली होने से विशेष है। जैसे साकेत नगरी संसार के कारण स्वरूप है वैसे ही यह मिथिला समस्त आनंद का कारण स्वरूप है। इसलिए महर्षिगण समस्त परिग्रहों को छोड़कर राम की आराधना के लिए प्रयत्नपूर्वक यहीं निवास करते हैं। श्रीसावित्री तथा श्रीगौरी जैसी देव-शक्तियों ने यही जन्म ग्रहण किया। स्वयं सर्वेश्वरेश्वरी श्रीसीता जी की जन्मभूमि यह मिथिला यत्नपूर्वक वास करने से समस्त सिद्धियों को देने वाली है।

महाभारत में मगध के बाद (उत्तर) मिथिला की स्थिति मानी गयी है। श्रीकृष्ण, अर्जुन तथा भीम की मगध-यात्रा का वर्णन करते हुए पहले सरयू नदी पार करके पूर्वी कोशल प्रदेश तथा फिर महाशोण, गण्डकी तथा सदानीरा को पार करके मिथिला में जाने का उल्लेख हुआ है। पुनः गंगा तथा महाशोण को पार करके मगध में जाने की बात कही गयी है। इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि उस समय मगध के उत्तर में मिथिला की ही स्थिति मानी गयी है। वज्जि प्रदेश (वैशाली राज्य) मिथिला के अंतर्गत ही समाविष्ट था। महाभारत के इस उल्लेख में भी मिथिला के सीमा क्षेत्र के बारे में अन्यत्र उल्लिखित पश्चिम में गंडकी तथा दक्षिण में गंगा तक के क्षेत्र यथावत् संकेतित होते हैं।

वृहद्विष्णुपुराण में मिथिला की सीमा (चौहद्दी) का स्पष्ट उल्लेख करते हुए कहा गया है कि-

कौशिकीन्तु समारभ्य गण्डकीमधिगम्यवै।
योजनानि चतुर्विंश व्यायामः परिकीर्त्तितः॥
गङ्गा प्रवाहमारभ्य यावद्धैमवतम्वनम् ।
विस्तारः षोडशप्रोक्तो देशस्य कुलनन्दन॥

अर्थात् पूर्व में कोसी से आरंभ होकर पश्चिम में गंडकी तक 24 योजन तथा दक्षिण में गंगा नदी से आरंभ होकर उत्तर में हिमालय वन (तराई प्रदेश) तक 16 योजन मिथिला का विस्तार है।

महाकवि चन्दा झा ने उपर्युक्त श्लोक का ही मैथिली रूपांतरण करते हुए मिथिला की सीमा बताते हुए लिखा है कि

गंगा बहथि जनिक दक्षिण दिशि पूब कौशिकी धारा।
पश्चिम बहथि गंडकी उत्तर हिमवत वन विस्तारा॥

इस प्रकार उल्लिखित सीमा के अंतर्गत वर्तमान में नेपाल के तराई प्रदेश के साथ बिहार राज्य के पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, शिवहर, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, वैशाली, समस्तीपुर, बेगूसराय, दरभंगा, मधुबनी, सुपौल, मधेपुरा, सहरसा, और खगड़िया जिले का प्रायः पूरा भूभाग तथा भागलपुर जिले का आंशिक भूभाग आता है।

भारत में प्रस्तावित मिथिला राज्य (जिला सहित)
यह सीमा प्राचीन उल्लेखों के अनुसार है संभवतः कोसी की अत्यधिक प्रसिद्धि तथा अनियंत्रित फैलाव के कारण भी पूर्वी सीमा कोसी को माना गया है। बाँध बनने से पूर्व कोसी का कोई नियत मार्ग नहीं रहा है। पूर्वी बिहार के सभी क्षेत्रों से प्रायः कोशी बही है। अतः महानंदा नदी से पश्चिम[21] अर्थात पश्चिम बंगाल आरंभ होने से पहले का पूरा पूर्वी बिहार (अररिया, किशनगंज, पूर्णिया और कटिहार भी) मिथिलांचल का ही स्वाभाविक भाग रहा है।

वृहद्विष्णुपुराण में गंगा तथा हिमालय के बीच स्थित मिथिला के अंतर्गत मुख्य 15 नदियों की स्थिति बतायी गयी है। उनके नाम इस प्रकार हैं:-

  1. कोसी
  2. कमला
  3. विण्ववती (विल्ववती= बेलौंती)
  4. यमुना (=जमुने, अधवारा समूह की नदी जो छोटी बागमती में मिलती है। यह नेपाल में जनकपुर के पास से बहती हुई बिहार में मधुबनी जिले के हरलाखी के पास से बहती है।)
  5. गैरिका (=गेरुआ, बाद में धारा-भेद से प्रचलित अनेक नाम -फरैनी, कजला, कमतारा, गोरोभगड़, चकरदाहा, नीतिया धार आदि का प्राचीन रूप-नाम)
  6. जलाधिका वाग्मती (बागमती)
  7. व्याघ्रमती (छोटी बागमती, मूलत: बघोर नदी जिससे अधवारा समूह की नदियाँ मिलकर छोटी बागमती बनती है जो उत्तर से दक्षिण दरभंगा के बीच से होकर बहती है।)
  8. विरजा
  9. गण्डला (गण्डक/बूढ़ी गण्डक)
  10. इक्ष्वावती (संभवतः लच्छा धार जिससे होकर करीब तीन दशक तक कोसी की मुख्यधारा भी बही थी; अथवा बैती नदी जो अब कोसी तटबंध में समा दी गयी है।)
  11. लक्ष्मणा (लखनदेई)
  12. गण्डकी
  13. अकुक्षि वर्त्तिनी (भुतही बलान)
  14. जङ्घा (संभवतः धेमुरा)
  15. जीवापिका (जीववत्सा= जीबछ)

ये सब अपेक्षाकृत तत्कालीन बड़ी नदियों के नाम हैं; परंतु इनके अतिरिक्त भी मिथिलांचल में अनेक छोटी-छोटी नदियाँ प्राचीन समय से आज तक अनवरत प्रवाहित हैं और मिथिला के ‘तीरभुक्ति’ नाम को सार्थक कर रही हैं।

 

 

Source : wikipedia.org

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