“मेरी पहचान.. मेरी मां…” मातृ दिवस पर रेशमा प्रसाद की एक कविता

मेरी पहचान मेरी मां
मैं तुमसे दूर हो गई 
ये मेरा कसुर नही 
मेरा दिल नही करता
मैं तुमसे दूर जहां मे जांऊ
हर मां अपने बच्चे को
प्यार दिल मे रख करती
हे मां तुझको सोचना होगा
मर्द को मर्द ना बनाओ
औरत को औरत ना बना
एक अच्छा इंसान बना दो
हे मां तेरे आंचल का प्यार
तेरी ताकत दुनिया बदल दे
दुनिया ने उलझी ऱीत बनाई
तूने भी उलझी रीत को चुना
मां कहती कि तु आखों में
काजल क्यों लगाए तू मर्द है
मां कहती कि तेरा ए सजना
ए सवरना ठीक नहीं तू मर्द है
मां कहती तेरा इन गुड्डे गुडियों
से खेलना तुझे जीने नहीं देगा
हे मां तुझे मेरी पहचान को
स्वीकारना होगा लड़ना होगा
समाज की बेड़ियां मेरी मां के
ममत्व को मार डाला आह ए
मेरी मां मुझे तो देखा होता
तूने जो पैदाइश पर दर्द सहा
क्या उस पीडा़ पर भी बेटा
या बेटी पहचान लिखा होगा
एक मां बनने की खुशी आई
उन खुशियों में एक बेटा ही
या एक बेटी ही लिखी होगी
ना सोचो कि मुझे बेटे की खुशी
ना सोचो कि मुझे बेटी की खुशी
सोचो एक इंसान जनने की खुशी
दुनिया जो उलझी रीत बनाई
मेरी पहचान तुमसे दूर ले गई
हे मां तुझे समाज की जकड़न तोड़ना होगा
हे मां तुझे उन बेड़ियों को तोड़ना होगा
वो महान मां जो वेडि़.यो को तोड़ा
मैं उन महान मां को सलाम करती
मै उनके जज्बे को सलाम करती
उनके अपने मां होने को सलाम करती
उनके मां के प्यार को सलाम करती

 

लेखिका : रेशमा प्रसाद, ट्रांसजेण्डर अधिकार कार्यकर्ता, पटना, बिहार।

(लेखिका समलैंगिक, किन्नर, ट्रांसजेंडर, सेक्स वर्कर समुदाय के लिए आवाज उठाती है और दलितों, महिलाओं एवं पर्यावरण के मुद्दे के साथ खड़ी  है)

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