राजा नरेंद्र सिंह के समय झंझारपुर में छावनी थी और कन्दर्पीघाट में युद्ध हुआ था . दरभंगा महाराज की संताने बचपन में ही गुजर जाया करती थी,तब महाराज प्राताप सिंह (१७६०-१७७६ )ने किसी संत के कहने पर झंझारपुर में ड्योढ़ी बनाना प्रारंभ किया |मगर दुर्भाग्यवश वे निःसंतान ही मरे |ड्योढ़ी भी नहीं बनवा सके | उनके भाई मधु सिंह ने इस ड्योढ़ी को पूरा करवाया |

महारानियों को प्रसव होने के कुछ समय पूर्व ही यहाँ भेज दिया जाता था | राज परिवार के बच्चे का मुंडन संस्कार भी झंझारपुर से कुछ मील दूर चंदेश्वर स्थान में हुआ करता था | कालान्तर में यह प्रथा समाप्त होती चली गयी |महाराज महेश्वर सिंह (१८५०-१८६०) का अधिकतार समय झंझारपुर में ही बीतता था | १८६०ई० में झाझारपुर में चौथम घाट जाते समय बहेड़ा थाना के पास शंकर रोहाड़ तालाब के किनारे उनकी मृत्यु हो गयी थी | ड्योढ़ी की जगह आज औद्द्योगिक प्रांगण है तथा ड्योढ़ी भगवती मंदिर के स्थान के आगे दुर्गा मंडप एवं चिल्ड्रेन पार्क बन गया है |महाराजा के आगमन ने यहाँ ब्राह्मणों के साथ-साथ कसेरा ,मारवाड़ी तथा हरिजनों की तादात को तो बढाया ही , भण्डार के रखवाले (भंडारी ) केवट जाति की संख्या में भी काफी बढ़ोत्तरी करवायी . महाराज छत्र सिंह ने चंदेल राजपूतों को नारेदिगर परगना और चौधरी की उपाधि दी . आज भी राजपूत यहाँ चौधरी टाइटिल लगाते हैं .

बहरहाल ओमल्लो को आधार मानकर पी० सी० राय चौधरी ने डिस्ट्रिक्ट गजेटियर दरभंगा (१९६०ई०) में सूचित किया है कि झंझारपुर एक बड़ा तथा औद्द्योगिक गाँव है ,जो स्थानीय लोगों द्वारा कांस्य के वर्तन बनाने के लिए मशहूर है |ख़ास तौर पर यहाँ के लोग कांस्य का पनबट्टा तथा गंगाजली (जलपात्र ) बनाया करते हैं| यहाँ कांस्यकार औद्द्योगिक समिती स्थापित है जिसमें ५००सदस्य हैं जो धातु की घंटियों तथा कांस्य के अन्य वर्तन बनाने में व्यस्त रहतें हैं |यहाँ के व्यापारी मुख्य रूप से मुरादाबाद (उत्तरप्रदेश ) से क्षतिग्रस्त ताम्बे, कांस्य तथा अन्य धातु लाकर वर्तन बनाते तथा निर्यात करते हैं |यहाँ से वर्तन, ईख,कपास आदि का निर्यात दरभंगा,पटना,कोलकाता तथा उत्तरप्रदेश के कई स्थानों को किया जाता है .

कभी राजाओं-महाराजाओं की नगरी तथा कांस्य उद्द्योगों के लिए प्रसिद्ध यह झंझारपुर आज उद्द्योग विहीन हो चला है |राजा महाराजा अतीत के पन्नों में खो गए या फिर भुला दिए गए. कान्स्यकारों ने भी अपनी ठौर कहीं अन्य जगह ढूढ़ ली |

द्वारा : रमन दत्त झा (दरभंगा / पटना)

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