जुड़-शीतल : मिथिला नव वर्ष के साथ ही बिहार की संस्कृति का खास लोक-पर्व

वेदों, पुरानों एवं शास्त्रों के अनुसार जब सूर्य मकर संक्रांति से मेष संक्रांति में प्रवेश करता है तो इस तिथि को मेष संक्रांति मनाई जाती है। धार्मिक मान्यता अनुसार इस दिन पारंपरिक ढंग से पूजा-अर्चना करनी चाहिए। शास्त्रों में कहा गया है जो व्यक्ति संक्रांति के दिन दान-पुन्य करता है उसे स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है। मेष संक्रांति के दिन भारत के विभिन्न हिस्सों में अनेकों पर्व मनाये जाते है। जिसमें बिहू, बैशाखी, नववर्ष, जुड़ शीतल आदि है।

जुड़ शीतल बिहार में मनाया जाने वाला प्रमुख त्योहार में से एक है। जिसे पुरे बिहार प्रदेश में श्रधा और सुमन के साथ मनाया जाता है। यह पर्व मकर संक्रांति की तरह मनाई जाती है। जिस तरह मकर संक्रांति नए फसल के पैदावार पर मनाई जाती है। उसी प्रकार मेष संक्रांति खरीफ की नए फसल की ख़ुशी में मनाई जाती है। हालाँकि, पर्व मनाने की प्रथा सभी क्षेत्रों में अलग-अलग है।जुड़ शीतल मिथिला क्षेत्र में पूरी निष्ठा से मनाई जाती है। इस दिन सभी लोग प्रातकाल उठकर एक दुसरे को बासी जल से जुडाते है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन बासी जल से जुडाने पर पुरे वर्ष गर्मी कम लगती है। इस दिन बड़ी बहने अपने छोटे भाई को जल से जुडाते है। जबकि बासी पानी से ही पुरे घर और आँगन को शुद्ध किया जाता है। इस दिन बासी भात और बड़ी खाने की भी परम्परा है। अतः सभी लोग इस दिन बासी भात खाते है। इसके पीछे भी मान्यता है कि बासी भात खाने से जौंडिस नहीं होती है। जुड़ शीतल से एक दिन पूर्व पुरे भारत वर्ष में बैशाखी मनाई जाती है। किन्तु बिहार में सत्तूवान मनाई जाती है। इसके पीछे धार्मिक मान्यता है कि जिस तरह मकर संक्रांति में धान की नई पैदावार होती है। ठीक उसी तरह अप्रैल के महीने यानि की मेष राशि में खरीफ फसल की पैदावार होती है। मकर संक्रांति के दिन दही चूड़ा खाने का रिवाज है। जिसमें चूड़ा नए धान की कुटी होती है। उसी प्रकार बैशाखी यानि की सत्तूवान में दाल से बनी सत्तू को खाया जाता है। इसके अलावा इस दिन पेड़ में बासी पानी देने की भी प्रथा है।

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