कई दुर्लभ संयोगों के बीच 06 अप्रैल से वासंतिक नवरात्र आरंभ, मिलेगा सुख-समृद्धि का वरदान

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होने वाले वासंतिक नवरात्र का समापन रामनवमी के दिन होगा । चैत्र नवरात्रि में मां भगवती के सभी नौ रूपों की उपासना की जाएगी और आध्यात्मिक ऊर्जा ग्रहण करने के लिए श्रद्धालु विशिष्ट अनुष्ठान भी करेंगे। इस अनुष्ठान में देवी के नौ रूपों की आराधना की जाएगी I रामायण के अनुसार भगवान श्री राम ने चैत्र नवरात्र में देवी दुर्गा की उपासना करने के बाद रावण का वध करके विजय हासिल किए।

इस बार चैत्र नवरात्रि 6 अप्रैल से शुरू होकर 14 अप्रैल तक पूरे 9 दिनों की रहेगी। इस बार चैत्र नवरात्रि पर कई शुभ योग भी बन रहा है। इस बार चैत्र नवरात्रि में पांच सर्वार्थ सिद्धि, दो रवि योग का संयोग बन रहा है। ऐसे शुभ संयोग में नवरात्रि पर देवी उपासना करने से विशेष फल की प्राप्ति होगी । यह नवरात्रि धन और धर्म की वृद्धि के लिए खास होगी I

कर्मकांड विशेषज्ञ पं० राकेश झा शास्त्री ने बताया कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा 06 अप्रैल दिन शनिवार को वासंतिक नवरात्र रेवती नक्षत्र एवं वैधृति योग में आरंभ होकर 14 अप्रैल दिन रविवार को विजया दशमी के साथ संपन्न होगाI इस नवरात्र में माता अपनों भक्तो को दर्शन देने के लिए घोडा पर आ रही है I माता के इस आगमन से श्रद्धालुओं को मनचाहा वरदान और सिद्धि की प्राप्ति होगी I इस आगमन से राजनीती क्षेत्र में उथल-पुथल होंगे I इसके साथ ही माता की विदाई महिष पर होगी I भक्त इस पुरे नवरात्र माता की कृपा पाने के लिए दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालीसा, बीज मंत्र का जाप, भगवती पुराण आदि का पाठ करेंगे I

कलश पूजा से मिलेगी सुख-समृद्धि का वरदान

पंडित राकेश झा ने शास्त्रों का हवाला देते हुए बताया कि चैत्र नवरात्र व्रत-पूजा में कलश स्थापन का महत्व अति शुभ फलदायक है, क्योंकि कलश में ही ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र, नवग्रहों, सभी नदियों, सागरों-सरोवरों, सातों द्वीपों, षोडश मातृकाओं, चौसठ योगिनियों सहित सभी तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं का वास होता है, इसीलिए विधिपूर्वक कलश पूजन से सभी देवी-देवताओं का पूजन हो जाता है। नवरात्रि में कलश स्थापना का खास महत्व होता है। इसलिए इसकी स्थापना सही और उचित मुहूर्त में ही करनी चाहिए। ऐसा करने से घर में सुख और समृद्धि आती है। और परिवार में खुशियां बनी रहती हैं।

कन्या पूजन से मिलेगा मनोकामना पूर्ति का वरदान

ज्योतिषी पंडित राकेश झा शास्त्री ने भगवती पुराण के हवाले से बताया कि चैत्र नवरात्र में कन्या पूजन का विशेष महत्व है। वासंतिक नवरात्र में छोटी कन्याओं में माता का स्वरूप बताया जाता है। तीन वर्ष से लेकर नौ वर्ष की कन्याएं साक्षात माता का स्वरूप मानी जाती है। छल और कपट से दूर ये कन्यायें पवित्र बताई जाती हैं और कहा जाता है कि जब नवरात्रों में माता पृथ्वी लोक पर आती हैं तो सबसे पहले कन्याओं में ही विराजित होती है। भोजन कराने के बाद कन्याओं को दक्षिणा देनी चाहिए। इस प्रकार महामाया भगवती प्रसन्न होकर मनोरथ पूर्ण करती हैं।

पंडित झा ने बताया कि शास्त्रों के अनुसार एक कन्या की पूजा से ऐश्वर्य, दो कन्या की पूजा से भोग और मोक्ष, तीन कन्याओं की अर्चना से धर्म, अर्थ व काम, चार की पूजा से राज्यपद, पांच की पूजा से विद्या, छ: की पूजा से सिद्धि, सात की पूजा से राज्य, आठ की पूजा से संपदा और नौ कन्याओं की पूजा से पृथ्वी के प्रभुत्व की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में दो साल की कन्या कुमारी, तीन साल की त्रिमूर्ति, चार साल की कल्याणी, पांच साल की रोहिणी, छ: साल की कालिका, सात साल की चंडिका, आठ साल की शाम्भवी, नौ साल की दुर्गा और दस साल की कन्या सुभद्रा मानी जाती हैं।

नौ दिनों में पुरे नौ शुभ संयोग में वासंतिक नवरात्र

6 अप्रैल- घट स्थापना रेवती नक्षत्र में

7 अप्रैल- सर्वार्थ सिद्धि शुभ योग द्वितीया

8 अप्रैल- कार्य सिद्धि प्रीति योग तृतीया

9 अप्रैल- सर्वार्थ सिद्धि योग चतुर्थी

10 अप्रैल-लक्ष्मी पंचमी व सर्वार्थ सिद्धि योग

11 अप्रैल- षष्ठी तिथि रवियोग

12 अप्रैल- सप्तमी तिथि सर्वार्थसिद्धि योग

13 अप्रैल- अष्टमी तिथि स्मार्त मतानुसार व सुकर्मा योग

14 अप्रैल-रवि-पुष्य नक्षत्र और सर्वार्थ सिद्धि योग नवमी वैष्णव मतानुसार

कलश स्थापना के शुभ मुहूर्त

प्रातः काल 05:47 बजे से दोपहर 02:58 बजे तक

गुली काल मुहूर्त:- सुबह 05 :37 बजे से 07 :11 बजे तक

अभिजीत मुहूर्त:- दोपहर 11:30 बजे से 12:18 बजे तक

अपनी राशि के अनुसार करें मां की आराधना

मेष : रक्त चंदन, लाल पुष्प और सफेद मिष्ठान्न अर्पण करें।

वृष : पंचमेवा, सुपारी, सफेद चंदन, पुष्प चढ़ाएं।

मिथुन : केला, पुष्प, धूप से पूजा करें।

कर्क : बताशा, चावल, दही का अर्पण करें।

सिंह : तांबे के पात्र में रोली, चंदन, केसर, कर्पूर के साथ आरती करें।

कन्या : फल, पान पत्ता, गंगाजल मां को अर्पित करें।

तुला : दूध, चावल, चुनरी चढ़ाएं और घी के दीपक से आरती करें।

वृश्चिक : लाल फूल, गुड़, चावल और चंदन के साथ पूजा करें।

धनु : हल्दी, केसर, तिल का तेल, पीत पुष्प अर्पित करें।

मकर : सरसों तेल का दीया, पुष्प, चावल, कुमकुम और हलवा मां को अर्पण करें।

कुंभ : पुष्प, कुमकुम, तेल का दीपक और फल अर्पित करें।

मीन : हल्दी, चावल, पीले फूल और केले के साथ पूजन करें।

मां को ये करे अर्पण मिलेगा शुभता का वरदान

पंडित राकेश झा ने बताया कि जगत जननी को विविध भोग लगाने से मनोकामना पूर्ति, आयु-आरोग्य, बुद्धि, धन-संपदा, ऐश्वर्य की वृद्धि होती है I

प्रतिपदा- पूजा के पहला दिन शैलपुत्री को षोडशोपचार पूजा कर गौ घृत माता को अर्पण करना चाहिए। इससे आरोग्य लाभ की प्राप्ति होती है।

द्वितीया- दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी माता को शक्कर का भोग लगाकर दान करें I ऐसा करने से चिरायु का वरदान मिलता है।

तृतीया- तीसरे दिन मां चंद्रघंटा के पूजन में माता को दूध चढ़ाएं और उसे ब्राह्मण को दान कर दे। इससे ऐश्वर्य की वृद्धि होती है I

चतुर्थी- चौथे दिन कुष्मांडा माता के पूजा में मालपुआ का नैवेद्य अर्पण करें। इससे मनोबल बढ़ता है।

पंचमी- पांचवें दिन स्कंदमाता मां को केले का भोग लगाना चाहिए I इससे बुद्धि का विकास होता है।

षष्टी- छठवें दिन कात्यायनी के पूजन में मधु (शहद) चढ़ाएं। इससे सौंदर्य की प्राप्ति होती है I

सप्तमी- सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा में गुड़ से निर्मित भोग अर्पित करने से शोक से मुक्ति होती है I

अष्टमी- आठवें दिन महागौरी को नारियल का भोग लगाना चाहिए। इससे सभी इच्छाएं पूर्ति होती हैं।

नवमी- नौवें दिन मां सिद्धिदात्री को गृह निर्मित पकवान हलवा-पूड़ी,खीर और पुआ बनाकर चढ़ाना चाहिए I ऐसा करने से जीवन में सुख-शांति मिलती है।

लेखक : कर्मकांड विशेषज्ञ पंडित राकेश झा शास्त्री

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