मन्दार पर्वत बिहार राज्य के बंका जिले में स्थित छोटा सा पर्वत है। यह भागलपुर शहर के दक्षिण में लगभग ४५ किमी की दूरी पर स्थित है। इसकी ऊँचाई लगभग फीट 7०० फीट (21मीटर) है। यह एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। इसके शिखर पर दो मन्दिर हैं, एक हिन्दू मन्दिर और दूसरा जैन मन्दिर।

हिंदू हिंदू पौराणिक कथाओं में इसे मन्दराचल (मन्दर + स्थिर = मन्दर पर्वत) कहा गया है और इसी को मथनी बनाकर समुद्र मन्थन किया गया था। इस पर्वत के पास में ही ‘पापहरनी’ सरोवर है जिसमेंके बीच में स्थित मन्दिर में लक्ष्मी और विष्णु विराज रहे हैं। हालाँकि यह अब तक ज्ञात नहीं है। पहाड़ी की चोटी पर एक हिंदू और एक जैन मंदिर हैं। पहाड़ में कई पौराणिक कथाएँ हैं, जिन्हें मंदराचल पर्वत के नाम से जाना जाता है। पुराणों और महाभारत से मिले संदर्भों के अनुसार, इस पहाड़ी का उपयोग समुद्र को मंथन करने के लिए उसके अस्थि (समुद्र मंथन) से निकालने के लिए किया गया था। यह पहाड़ी से सटा हुआ है, एक तालाब जिसे “पफरानी” कहा जाता है। इस पवित्र तालाब का अपना ऐतिहासिक महत्व है। यह एक ऐसी जगह है जहां आप मानसिक और शारीरिक रूप से शौजा रहने वाले तालाब में स्नान करने के बाद खुद को पुनर्जीवित कर सकते हैं। तालाब के बीच में भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी का मंदिर है।

11-12वीं शताब्दी ईस्वी की मानी जाने वाली भगवान शिव, कामधेनु और वराह की कई दुर्लभ मूर्तियां, मंदार पहाड़ी के आसपास बिखरी हुई पाई जा सकती हैं। इन दुर्लभ कलाकृतियों को भारतीय एवं सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित किए जाने की आवश्यकता है।

मंदार के नीचे एक प्राचीन नगर हुआ करता था जिसे वालिशा नगर कहते थे जिसके साक्ष्य आज भी ज़मीन के नीचे मिलते हैं। इस नगर के विशाल मंदिरों-गोपुरमों के पत्थर अभी भी ज़मीन पर पड़े हुए हैं मगर इसका अधिकतम हिस्सा अज्ञानतावश लोग उठाकर ले गए। यहाँ से ऐसे नक्काशीयुक्त पत्थर 100 किलोमीटर की परिधि तक लोग ले गए। इन्हीं पत्थरों से बना देवघर का बैद्यनाथ मंदिर भी है जिसका प्रमाण वहाँ लगे राजा आदित्यसेन का एक शिलालेख और पत्थरों की प्रकृति भी है।
यहाँ दक्षिण के राजराजा राजेन्द्र चोल का बनवाया हुआ पत्थर का एक भवन भी है। जिसकी कलकारी ही बताती है कि यह भवन निर्माण शैली दक्षिण भारत की है।
मंदार के ऊपर सीता कुंड है यह पौराणिक गाथाओं का प्रमाण है। यहीं पास में पर्वत की शीला में खुदा हुआ एक विशाल सिर है जिसकी ऊंचाई 42 फीट है। शेरविल ने इसे ‘मिश्र की शैली’ का बताया है।
यहीं पास में नरसिंह गुफा है जिसमें भगवान नरसिंह की मूर्ति उत्कीर्ण है। इस गुफा में समुद्रगुप्त के समय का एक शिलालेख है।
इस पर्वत पर कई लिपियों में लगभग दर्जन भर शिलालेख हैं।
यहाँ पापहरिणी सरोवर के ऊपर बिहार का सबसे बड़ा शिलालेख है। यह अभिलेख 18×4 फीट का है। इसकी चर्चा विलियम फ्रेंकलिन ने ‘इन्क्वायरी कंसर्निंग द साइट ऑफ एन्सिएंट पालिबोथरा’ ने भी की है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संस्थापक कनिंघम ने भी मंदार के शिलालेखों के बारे में लिखा है। लगभग एक दर्जन से अधिक इतिहासपसंद अंग्रेज़ यहाँ आए और उन्होंने मंदार के बारे में लिखा।
दुख इस बात का है कि स्वयं प्रशासन ही विकास का हवाला देकर इसके ऐतिहासिक अमूल्य तथ्यों से जान-बूझकर छेड़छाड़ कर रहे हैं। कई शिलालेख बराबर नष्ट किए जा रहे हैं। किसी भी स्तर पर की गई शिकायत का कोई असर नहीं होता। पुरातत्व, कला व संस्कृति विभाग (बिहार सरकार), ए एस आई जैसी संस्थाएं मंदार के नाम पर कोई कार्रवाई नहीं करती। जैनियों ने भी पुरातात्विक महत्व के भरपूर साक्ष्य नष्ट कर दिये। जैन धर्म के लोग यहाँ अतिक्रमण में माहिर हैं। इनके विरुद्ध की गई शिकायत पर कोई संज्ञान नहीं लेता।

Source: Wikipedia.org

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