सिक्के के दो पहलू की तरह कला-संस्कृति के भी दो पहलू होते हैं। कला-संस्कृति के एक पहलू में जहां कलाकारी दिखती है और दूसरे पहलू में एक प्रचंड स्याह और कटु सत्य भी झांकता है; लेकिन हम अमूमन जान-बूझकर उस स्याह पक्ष और कटु सत्य को स्वीकार करने से बचते हैं। लोक-कलाओं में पुरुष द्वारा स्त्री का वेश धारण की परंपरा बहुत पुरानी है। यह एक कलाकारी तो है लेकिन बहुतेरे विधा ऐसी भी हैं जिसमें कलाकारी के साथ ही साथ सेक्सुआलिटी भी जुड़ी हुई है। वैसी ही एक विधा को हम नेटुआ या लौंडा नाच के नाम से जानते हैं।

बिहार की संस्कृति में “नेटुआ” नाच एवं “लौंडा” नाच का प्रचलन रहा है जिसमें कोई मर्द ही स्त्री जैसा रूप धारण करके नाचता, गाता है। कई लोग इसे संस्कृति की महान परम्परा में शुमार करते हैं लेकिन यह उन विधाओं में मूलतः स्त्री की कमी के विकल्प के रूप में ही अस्तित्व में आईं। अब उन विधाओं में स्त्रियों क्यों नहीं थीं यह एक अलग बहस का विषय है।

देवता-देवदासियों का नृत्य देखकर प्रसन्न होते हैं; धन धान्य और रसूखदार लोग बाईजी का नाच करवाते हैं, लेकिन जो इनका खर्च वहन नहीं कर सकते उनका क्या? तो विकल्प के रूप में लौंडा हाज़िर हुआ, जो अमूमन कम पैसे में स्त्री का आभास पैदा करते हुए गीत-संगीत और नृत्य का आंनद दे सके। जो स्त्री ना होते हुए भी स्त्री के जैसा रूप धारण कर कूल्हे, कमर इत्यादि मटकाता है और देखनेवालों की लालसा जनित कुंठा की ऐंद्रिक पूर्ति करता है। कई रसूखदार लोगों के यहां लौंडा रखने की परंपरा भी रही है। वैसे लौंडो के दैहिक शोषण की सच्ची कहानियां भी कुछ कम नहीं हैं और इससे भी इंकार नहीं कि इन लौंडों और नेटुआ लोगों ने नाच और संगीत की परंपरा का वहन भी किया है और कुछ हद तक नृत्य और संगीत की कई शैलियों को अपनी मुफ़लिसी और शोषण के बावजूद ज़िंदा भी रखा है। वहीं भिखारी ठाकुर जैसे महान कलाकार भी हुए जिन्होंने इस विधा को एक गरिमा प्रदान करने की चेष्टा की, लेकिन यह भी सत्य ही है कि ऐसे कार्य करनेवाले लोग और इस कला को गरिमामय दृष्टि से देखनेवाले लोग ज़रा कम ही हुए हैं समाज में।

कई लोग मानते हैं कि लौंडा या नेटुआ नाच विशुद्ध कलाकारी है लेकिन वो इस सवाल का जवाब देने से हिचकते हैं कि कलाकारी दिखाने के लिए एक पुरुष को स्त्री का वेश क्यों धारण करना पड़ता है और उसे स्त्री जैसे हावभाव के साथ ही साथ स्त्री का नकली शरीर और लुभावने जेस्चर-पोस्चर क्यों दर्शाने पड़ते हैं? जबकि वो अपनी नाच और गायन की प्रतिभा तो बिना स्त्री का रूप धारण किए भी प्रदर्शित कर सकता है। आखिर हमारी तृप्ति स्त्री या स्त्री जैसी महसूस होनेवाली किसी आकृति को नाचते देखने से ही क्यों तृप्त होती है? जब महफ़िल में बैठा व्यक्ति (मर्द) एक स्त्री का रूप धारण किए व्यक्ति को नाचते, गाते और कूल्हे मटकाते व लुभावने बोल के गीत गाते देखता-सुनता है तो क्या वो केवल कलाकारी देख रहा है या उसकी दृष्टि कहीं और भी है? और फिर गाने के बोल भी एक से एक अश्लील नहीं हैं क्या? लौंडा बदनाम हुआ जैसे अनगिनत कुख्यात गीतों को सुनने के पश्चात क्या इस बात का सही सही अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता?

यह नाच आज भले ही अपने संस्कृति की गरिमा गाथा में अपना स्थान पा लिया हो, परन्तु सच तो यह है कि वह स्त्री को ही बाजारू और फूहड़ रूप में प्रस्तुत करने का एक कुत्सित रूप है और एक मजबूर इंसान की मजबूरी भी है, जो अपने रोजी-रोटी के लिए इस रूप को धारण कर अपनी बहुरंगी अदा व कुछ श्लील व कुछ अश्लील गीतों से समाज के पुरुषों को मनोरंजन करवातें आए हैं। समाज के कुछ पुरुष वर्ग अपनी कामवासना की तृप्ति के लिए इस नाच को बढ़ावा देते आये हैं।

किसी ज़माने में लौंडा नाच या नेटुआ नाच खूब प्रचलन में था। शादी-ब्याह, पर्व-त्वेहार से लेकर बच्चे के जन्म पर भी नाच करवाने भी खूब प्रचलन में था। लेकिन अब इसमें बदलाव आया है। इसका अर्थ यह नहीं कि लोगों ने अश्लीलता का साथ छोड़ दिया है बल्कि लोगों को डीजे पर नाच से लेकर शेर की जाली जैसी वस्तु में नाचती स्त्रियां और स्त्री आकृतियां अब आसानी से उपलब्ध है। आर्केस्ट्रा जैसी डांस कम्पनियों ने अपना स्थान बड़ी तेजी से बनाया है और डीजे तो जैसे सर चढ़कर नाच रहा है।

जिस कमी को पूरा करने के लिए पुरुष द्वारा लौंडा नाच प्रस्तुत किया जाता था अब उस कमी की भरपाई बड़ी सहजता से स्त्रियों से हो जाती है और बदहाली का आलम यह है कि कम से कम पैसों में भी ये उपलब्ध हो जातीं हैं तो भला कोई कृतिमता का उपयोग क्यों करे? हालांकि यह लड़कियाँ भी कहीं न कहीं मजबूरन ही इस पेशे में जाती है या इस पेशा को चुनती है।

समाज चाहे कोई भी हो यदि वो अपनी कुरीतियों को दुरुस्त करना चाहता है तो उसे सबसे पहले सत्य को स्वीकार करना होगा, ना कि उसे कला और संस्कृति के चमकदार आंचल में छुपाकर रखना होगा। संस्कृति में कुछ विकृतियां भी होतीं हैं, जिसे यथाशीघ्र दुरुस्त किया ही जाना चाहिए।

लेखिका : रेखा सिंह, पटना

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