मिथिला का धरोहर : सूर्य मंदिर, कन्दाहा, सहरसा

असतो मा साद गमय, तमसो मा ज्योतिर् गमय, मृत्योर मा अमृतम् गमय

सूर्य यानि साक्षात भगवान जिनका हम नित्य दर्शन करते हैं जिनके बिना जिंदगी अंधकारमय हो जाय | यह मात्र हमारे आस्था का नहीं बल्कि जिंदगी उन पर आश्रित है | सूर्य हमारे आराध्य हैं इनका मंदिर हमारा पूजा स्थल है | सूर्यदेव को हम अर्घ देते हैं फिर क्यों उपेझित हैं सूर्य मंदिर ?
मिथिला के महिषी प्रखंड में स्थित कन्दाहा का सूर्य मंदिर पर लिखी लिपि और काले पत्थर की सूर्य देव की मूर्ति 14 वीं शताब्दी से भी पुरानी है लेकिन वहां तक जाने का अच्छी व्यवस्था नहीं , मंदिर की भी हालत ठीक नहीं , द्वार पर लिखी लिपि भी घिस रही है | हम महोत्सव मनाते हैं लेकिन इसपर हमारा ध्यान कब जायेगा ??

वैसे तो दुनिया में सबसे पुराना सूर्य मंदिर मुल्तान और भारत में कोणार्क की चर्चा होती है लेकिन अन्य राज्यों में भी सूर्य के मंदिर हैं | सबसे नवीन कर्णाटक के बंगलौर के डोलमुर में सूर्यनारायण मंदिर का निर्माण सूर्य की है जहाँ काफी श्रद्धालु जाते हैं , बिहार के औरंगाबाद के देव मंदिर का भी इधर काफी चर्चा होती है लेकिन कंदाहा गांव में स्थित सूर्य मंदिर की उपेझा समझ में नही आता |

इस मंदिर का जीर्णोद्धार दरभंगा के राजा भवदेव सिंह द्वारा किये जाने के भी कई प्रमाण दरभंगा महाराज के संग्रहालय में उपलब्ध दस्तावेजों से मिलते है | साथ ही महाभारत व सूर्य पुराण में भी इसकी चर्चा है | चौखट की शिलालेख पर अंकित लिपि अब मिटती जा रही है | लेकिन यह शिलालेख मैथिली के महान कवि विद्यापति के समकालीन ओइनवर वंश के शासक नरसिंह देव के शासनकाल के वक्त का है | इस मंदिर परिसर में एक पुराना कूप भी है  |

एकबार वहां गया था इस धरोहर को स्थानीय ग्रामीण ने हीं संभाल कर रखा है l सूर्य देव को नमस्कार और मिथिला के कंदाहा ग्राम के ग्रामीणों का वंदन |

लेखक : रमन दत्त झा (दरभंगा/पटना)

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