क्लीवलैंड मेमोरियल : भूल गया भागलपुर अपने पहले कलक्टर क्लीवलैंड को

स्मार्ट बनने जा रहे अपने सिटी को निखारने हेतु विभिन्न योजनाओं के साथ तिलकमांझी चौक भाया नगर निगम होकर विश्वविद्यालय तक जानेवाली सड़क को विदेशी तकनीक से बना हाई-फाई ट्रैफिक सिस्टम लागू कर हाईटेक स्वरूप देने के साथ आदमपुर-मशाकचक क्षेत्र में शरत्-बनफूल सरीखे लेखक व सिने स्टार अशोक कुमार-किशोर कुमार की स्मृतियों को सहेजकर हेरिटेज कलस्टर बनाने की बात हो रही है। इसी रोड पर तिलकामांझी चौक से चंद कदम आगे बाईं ओर ग्रेनाइट से बना एक चमचमाता प्रवेश द्वार है जिसके उपर खूबसूरत मैटल अक्षरों में लिखा है ‘क्लीवलैंड मेमोरियल-1786’। पर ट्रैफिक की आपा-धापी में इस रोड से गुजरनेवाले 95 फीसदी लोगों की नजरें इस ओर नहीं पड़ पाती।

प्रथम कलक्टर का है यह स्मारक:
भागलपुर जिला गजेटियर,1962 बताता है कि जिस आगस्तस क्लीवलैंड का यह मेमोरियल है, वे भागलपुर के पहले कलक्टर थे जिनकी मृत्यु मात्र 29 वर्ष की आयु में हो गयी थी। कुशल प्रशासक होने व राजमहल की पहाड़ियों में रहनेवाली पहाड़िया आदिम जनजाति को सामान्य धारा में लाने के कारण उनकी ब्रिटिश प्रशासनिक हलके में खासी ईज्जत थी। उनकी मृत्यु के बाद गवर्नर जनरल के आदेश से टिल्हा कोठी स्थित उनके आवास के सामने एक स्मारक बनवाया गया। उनकी स्मृति में एक दूसरा स्मारक उनके प्रशंसक व स्थानीय जमींदारों ने 1786 में तिलकामांझी चौक के पास बनवाया। झारखंडी झा अपनी पुस्तक में एक तीसरे स्मारक ‘क्लीवलैंड रोड’ की चर्चा करते हैं जो तिलकामांझी चौक से विश्वविद्यालय तक जाता था। इस नाम से मेमोरियल के निकट एक स्टोन स्लैब भी लगा था जो पिछले अतिक्रमण हटाओ अभियान में कहीं पर उठाकर रख दिया गया। सम्प्रति इस रोड का नाम विवेका नन्द पथ रख दिया गया है।

वास्तु-शिल्प:
क्लीवलैंड मेमोरियल के निर्माण की खासियत यह है कि एक यूरोपीय शख्स के स्मारक के लिये मंदिरनुमा शैली का प्रयोग किया गया है। इस संबंध में मौण्टगोमरी मार्टिन व फ्रांसिस बुकिनन बताते हैं कि ईंट निर्मित यह एक सुंदर स्मारक है जो दूर से देखने पर प्रशंसनीय प्रतीत होता है। इसपर हिंदू पिरामिड जैसी आकृति है और यह ग्रीसियन गैलरी से घिरा है। इतिहासकार डा. रमन सिन्हा इसे ब्रिटिश-भारतीय शैली का मिश्रित नमूना बताते हैं।

जीर्णोद्धार:
कालक्रम में कोलकाता के बिशप हारबर (1783-1826) व अंग्रेज पेन्टर सर चार्ल्स डी’ आयली (1781-1845) सरीखे लोगों ने इस स्मारक का भ्रमण किया और इसकी सुन्दरता को सराहा। पर बाद के वर्षों में यह उपेक्षित-सा रहा। वर्ष 11 में जिला प्रशासन द्वारा करीब 17 लाख 36 हजार की लागत से इसका जीर्णोद्धार व सुंदरीकरण कराकर स्मारक जाने हेतु पीसीसी परिपथ का निर्माण और इसके दोनों तरफ से ग्रील की खुबसूरत फैंसिंग व गार्डेनिंग, बैठने हेतु सिमेन्टेड बैंच, स्मारक के सामने गोलम्बर, ग्रेनाईट का प्रवेश-द्वार आदि के निर्माण करवाये। पर समुचित रख-रखाव के अभाव में इसमें झाड़-झंखाड़ उग आये हैं जिसपर थोड़ा-सा ध्यान देकर इसकी पुरानी रौनक को वापस लाया जा सकता है।

शोर-शराबे के बीच सुकून की जगहः
आज के भागम-दौड़ की जिंदगी के बीच कोई सोच भी नहीं सकता कि तिलकमांझी चौक जैसे व्यस्ततम इलाके से कुछ ही दूरी पर क्लीवलैंड मेमोरियल जैसा कोई तफरीह की भी माकूल जगह है। इसे स्मार्ट सिटी के हेरिटेज प्लानिंग में शामिल कर न सिर्फ शहरवासियों को एक खुबसूरत पार्क, वरन् सैलानियों को एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर से रूबरु कराया जा सकता है।

क्लीवलैंड मेमोरियल का प्रवेश द्वार

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लेखक : -शिव शंकर सिंह पारिजात (इतिहासकार),
अव. उप जनसम्पर्क निदेशक

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