मुश्किलों में भी हौसला कायम रखना : डा. श्वेता दीप्ति

मुश्किलों में भी हौसला कायम रखना, क्योंकि सहजता से कुुछ हासिल नहीं होता : डा. श्वेता दीप्ति

डा. श्वेता दीप्ति बिहार के मधेपुरा जिला उदाकिशुनगंज की रहने वाली है | इनका बचपन बिहारीगंज में गुजरा जहाँ इनकी माँ कन्या उच्च विद्यालय की प्रधानाध्यापिका थीं । इनके पिताजी मधुबनी में कार्यरत थे । इनकी मैट्रिक तक की पढाई बिहारीगंज से हुई और फिर इन्टर करने के लिए भागलपुर चली गई, जहाँ से इन्होने सुन्दरवती महिला महाविद्यालय से इन्टर से बी.ए आनर्स तक की पढाई की और एम.ए केन्द्रीय हिन्दी विभाग से करने के बाद पीएचडी तक की उपाधि प्राप्त की । एम.ए की परीक्षा के दौरान ही इनके पिता जी का साथ छूट गया फिर भी इन्होने परीक्षा दी और इनका मानना था की गुरुजनों और बडों का आशीर्वाद था कि उस मनःस्थिति में परीक्षा देने के बावजूद इन्होने प्रथम श्रेणी प्राप्त किया । घर से दूर छात्रावास में रहकर इन्होने अपना ये समय गुजारा । पीएचडी इन्होने केन्द्रीय हिन्दी विभाग भागलपुर के प्रोफेसर डा. बहादुर मिश्रा के निर्देशन में किया । इनके शोध का विषय था “उषा प्रियम्बदा के कथा साहित्य में चित्रित नारी जीवन की त्रासद परिस्थितियाँ ।” श्वेता दीप्ति पूरी श्रद्धा और यकीन से कहती है कि अगर उनका मार्गदर्शन उस वक्त इनको नहीं मिला होता तो शोध जैसा दुरुह कार्य इनके लिए सम्भव नहीं था । क्योंकि वो दौर सिर्फ और सिर्फ पुस्तकों तक सीमित था इन्टरनेट का जमाना नहीं था । इनका चयनित विषय भी कठिन था चुँकि उषा जी पर शोध कार्य नहीं हुआ था, उनके विषय में जानकारियाँ कम थीं । पर एक सुखद अनुभूति इनको उस वक्त हुई जब इन्होने डा. ऊषा प्रियम्बदा को अमेरिका खत लिखा और श्वेता दीप्ति को उनका जवाब मिला जिसने इनके कार्य को सहज किया । इनका बचपन लाड़–प्यार में गुजरा और एक भाई की इकलौती बहन जिसे बड़े भाई का साथ और स्नेह हर कदम पर मिला । इनके दौर में इतना सहज नहीं था घर से बाहर रहकर शिक्षा हासिल करना किन्तु इनकी माँ की प्रतिबद्धता, इनके भैया का सहयोग, इनके पिता जी के मौन समर्थन ने कभी इनको हतोत्साहित नहीं होने दिया । श्वेता दीप्ति यह कह सकती है कि एक सुखद और संघर्ष से परे इनका बचपन ही नहीं युवावस्था भी गुजरा जहाँ सबकुछ इनका मर्जी से इनको मिला | उसी दौरान इन्होने एलएलबी भी किया । पटना हाईकोर्ट से लाइसेंस लिया । उसी वक्त बिहार एजुकेशन प्रोजेक्ट में इन्होने नौकरी के लिए आवेदन किया था परिणाम की प्रतीक्षा कर रही थी पर इनकी जिन्दगी का दूसरा दौर उस वक्त शुरु हुआ जब इनकी शादी नेपाल में हुई । जहाँ रहने की कल्पना भी कभी इन्होने नहीं की थी और न ही इनकी अपनी इच्छा और अनिच्छा जताने की परिस्थिति उस वक्त थी । शादी होनी थी हो गई । एक अपरिचित माहोल में इनको आना पड़ा जहाँ सबसे पहली इनको यह हिदायत मिली कि अब इनको हिन्दी में बात नहीं करनी है । यह स्थिति इनके लिए अनपेक्षित तो थी उतनी ही कष्टकर भी । क्योंकि हिन्दी ही इनका आधार था और उससे ही इनको काटा जा रहा था । काठमान्डौ आकर प्रवास का सही अर्थ इनको समझ में आया । आज तो सहज है काठमान्डौ में हिंदी बोलना लेकिन उस वक्त यह मुमकिन नहीं था ।  शादी के बाद तुरंत बिहार एजुकेशन प्रोजेक्ट से इनको नियुक्ति पत्र आया पर तभी इनकी जिन्दगी का फैसला इनके हाथों से निकल चुका था । इनको अनुमति नहीं मिली और यह श्वेता दीप्ति अपने जिन्दगी की सबसे बड़ी गलती मानती है कि उस वक्त इन्होने जिद नहीं किया ।  इसके बाद पूरे दस वर्ष श्वेता दीप्ति घर में रही और जहाँ इनकी शिक्षा या डिग्री की कोई उपयोगिता नहीं थी । नेपाल में हिन्दी के लिए गिनी चुनी जगह थी, जहाँ नौकरी मिल सकती थी । सीबीएससी बोर्ड के स्कूलों में इनको इसलिए छाँटा गया क्योंकि उन्हें पीएचडी होल्डर शिक्षक नहीं चाहिए था । शादी के ग्यारहवें वर्ष में श्वेता दीप्ति यह जान पाई कि नेपाल के त्रिभुवन विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग है । उससे पहले आंशिक शिक्षक के रुप में इन्होने एक वर्ष जनकपुर राराब कैम्पस में गुजारा पर ये अपने बेटे की अस्वस्थता की वजह से नौकरी छोड़कर पुनः काठमान्डौ आ गई । जहाँ केन्द्रीय विभाग में श्वेता दीप्ति कोशिश की और तीन वर्षों तक आंशिक शिक्षक के तौर पर ही काम कर पायी । फिर इन्होने सेवा आयोग की परीक्षा पास की और आज स्थायी जॉब में है । श्वेता दीप्ति को मानसिक तनाव से गुजरना कई बार तोड़ता रहा पर हर बार इनकी माँ ने इन्हे संभाला । इसी बीच नेपाल से प्रकाशित होने वाली हिन्दी मासिक पत्रिका हिमालिनी से जुड़ने का अवसर श्वेता दीप्ति को मिला जहाँ आज ये संपादक है । इस दरमियान इनकी सात पुस्तकें —  अनुभूतियों के बिखरे पल (कविता संग्रह),  विविधा,  नारी जीवन विगत से वर्तमान, उषा प्रियम्बदा की नारी पात्र की मानसिक त्रासदी (शोध पुस्तक), मोदियाइन (भोजपूरी भाषा में अनूदित), आधुनिक कविता की परम्परा : एक अनुशीलन, भारतीय एवं पाश्चात्य काव्यशास्त्र प्रकाशित हो चुकी हैं । इनकी कई पुस्तकें प्रकाशाधीन हैं ।

श्वेता दीप्ति का मानना है की इनकी एक पहचान तो बनी पर अपनी मिट्टी से दूर होने की कसक इनको आज भी है, जो तब और बढ़ जाती है जब अपने ही जन्मस्थान और देश के लिए ये नेपाल में विरोध देखती है । श्वेता दीप्ति का यह भी मानना है की किन्तु जिन्दगी शायद यही है जहाँ सब कुछ आपके अनुकूल नहीं होता । अपनी राह बनानी पड़ती है, बावजूद इसके जरुरी नहीं कि मंजिल मिल ही जाय । पर आवश्यक है कि हौसलों को जिन्दा रखें ।

श्वेता दीप्ति अपनी एक कविता के साथ अपनी बात खत्म करना चाहती है…..

माँ कहती थी

माँ कहती थी

तुम मेरी सोन चिरैया हो

‘किसी देश में एक राजा था

और उसकी जान

उसके तोते में कैद थी ।’

माँ कहती थी

तुम मेरी सोन चिरैया हो

और मेरी जान बसती है

उसी राजा के तोते की तरह

तुममें ही ।

माँ कहती थी, तेरे होठों की हँसी

और आँखों की चमक में

जिन्दा हूँ मैं ।

और एक दिन तुमने ही

उड़ा दिया अपनी सोन चिरैया को

अपने सुरक्षित आँचल से निकाल,

एक अनजानी दिशा में

माँ कहती थी

तुम मेरी सोन चिरैया हो ।

उड़ना चाहती थी

तुम्हारी सोन चिरैया

अपने कमजोर पंखों के साथ

हवा से विपरीत दिशा में

क्योंकि तुम्हारे सपने

तुम्हारी सोन चिरैया की

आँखों में बसे थे ।

उसे सच करने की

जिद थी उसकी

क्योंकि तुम कहती थी

कि मैं तुम्हारी सोन चिरैया हूँ

जिसमें बसती है तुम्हारी जान ।

पंख टूटे, हौसलों ने साथ

छोड़ने की कोशिश भी की

पर तुम्हारी सोन चिरैया

तुम्हारे सपनों में खुद को जीती

आज भी कायम है

बहती विपरीत धार में ।

माँ कहती थी

तुम मेरी सोन चिरैया हो ।

हाँ माँ ! मैं तेरी सोन चिरैया हूँ

मैंने जिन्दा रखा है

अपने होठों की हँसी

और आँखों की चमक को

क्योंकि तुम इसमें जिन्दा हो ।

माँ कहती थी

तुम मेरी सोन चिरैया हो ।

श्वेता दीप्ति का अकादमिक परिचय :

नाम : डॉ श्वेता दीप्ति

शिक्षा : विद्यावारिधि (तिलकामाँझी भागलपुर विश्वविद्यालय), भागलपुर, बिहार, भारत ।

सम्प्रति : केन्द्रीय हिन्दी विभाग, त्रिभुवन विश्वविद्यालय, कीर्तिपुर, काठमान्डौ, नेपाल |

सम्पादक : हिमालिनी हिन्दी मासिक पत्रिका, काठमान्डौ, नेपाल |

सम्पादक : साहित्य लोक (केन्द्रीय हिन्दी विभाग द्वारा प्रकाशित मुखपत्र)

सह–सम्पादक (नेपाल प्रतिनिधि) : जर्नल आफ ह्यूमेनिटीज एण्ड सोशल साइंस, अलीगढ़, उत्तरप्रदेश, भारत

संलग्नता : जरा फाउन्डेशन (साहित्य एवं संस्कृति), काठमान्डौ, नेपाल |

अन्य उपलब्धिया : स्नातकोत्तर अध्यापन तथा शोध निर्देशन कार्य । साहित्य के विभिन्न विधाओं में स्वतंत्र लेखन । नार्वे की हिन्दी पत्रिका स्पाइल दर्पण और भारत और नेपाल के विभिन्न हिन्दी और भोजपुरी पत्रिकाओं में कहानी, कविता, आलेख और लघु कथाएँ प्रकाशित । साहित्यिक और राजनीतिक विषयों पर दूरदर्शन पर अन्तरवार्ता प्रसारित । विभिन्न साहित्यिक कार्यक्रमों में कार्यपत्र एवं कविता वाचन । केन्द्रीय हिन्दी विभाग द्वारा विभिन्न कार्यशालाओं की सफलतापूर्वक आयोजन । विश्व हिन्दी दिवस पर नेपाल और भारत के बीच सांस्कृतिक सम्बन्ध पर कार्यपत्र प्रस्तुति । नेपाल से प्रकाशित हिमालिनी हिन्दी पत्रिका द्वारा आयोजित समय सन्दर्भ कार्यक्रम में सक्रिय भूमिका । नेपाली भोजपूरी संस्थान काठमान्डौ, नेपाल द्वारा आयोजित वार्षिक कार्यक्रम में कबीर के व्यक्तित्व पर व्याख्यान । शिवाजी विश्वविद्यालय कोल्हापुर महाराष्ट्र द्वारा आयोजित अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में साहित्य और इतिहास पर व्याख्यान । विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई दिल्ली के सहयोग से आयोजित दीनदयाल विश्वविद्यालय में अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी में नारी अस्मिता और हिन्दी साहित्य पर व्याख्यान । नेपाली साहित्य मंच और हिन्दी विभाग द्वारा आयोजित हिन्दी साहित्य के महान कविवर केदारनाथ सिंह जी के सम्मान कार्यक्रम में सक्रिय सहभागिता । ललितनारायण  विश्वविद्यालय हिन्दी विभागदरभंगा  और सेन्ट्रल इंस्टीच्यूट आफ क्लासिकल तमिलचेन्न्ईद्वारा आयोजित तमिल वेद तिरुक्कुरल और हिन्दी कविता में नीति कार्यक्रम में रामचरित मानस में निहित नीति तत्व पर व्याख्यान ।

रुचि :- संगीत में ।

सम्मान / पुरस्कार :- नेपाल सरकार द्वारा नेपाल विद्याभूषण से सम्मानित । हिन्दुस्तानी भाषा अकादमी द्वारा समीक्षा सम्मान, नेपाल भारत मैत्री समाज, नेपाल हिन्दी प्रतिष्ठान, नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान, उर्दू प्रतिष्ठान नेपाल द्वारा सम्मानित ।

प्रकाशित कृतियाँ :-

अनुभूतियों के बिखरे पल (कविता संग्रह) – नारी मन के तहों को उधेड़ती नारी अन्तरमन का विषाद, हर्ष उल्लास, आकुलता तथा नारी जीवन की कठिन समस्याओं को सशक्त स्वर में सम्प्रेषण करती, साथ ही समसामयिकता का वर्णन, यर्थाथता का चित्रण, दुख और पीड़ा का आर्तनाद, प्रणय का मोहक आस्वादन सभी भावनाओं को एक साथ समेटती कविताओं का संग्रह है अनुभूतियों के बिखरे पल ।

मोदियाइन (भोजपूरी भाषा में अनूदित) – महाभारत के पृष्ठभूमि पर लिखी गई विशेश्वर प्रसाद कोईराला द्वारा रचित नेपाली भाषा का उपन्यास है मोदियाइन । इस उपन्यास में उपन्यासकार ने उस पहलू को छुआ है जो अनदेखा था । महाभारत में जो सैनिक मरे उनकी विधवाओं और परिवार की पीड़ा के अनदेखे पहलू को इस उपन्यास में जगह मिली है और साथ ही उपन्यासकार मानव जाति के लिए एक संदेश सम्प्रेषित करता है कि जीवन में बड़ा बनना कोई उपलब्धि नहीं है बल्कि सच्चा इंसान बनना आवश्यक है ।

उषा प्रियम्वदा का कथा जगत् और नारी त्रासदी (शोध पुस्तक) – मानसिक यंत्रणा, उथल-पुथल अथवा अन्तरद्वन्द्ध को साहित्य में पर्याप्त जगह मिली है । प्राचीन समय से लेकर आज तक साहित्य में किसी ना किसी रूप में इस द्वन्द्ध को चित्रित किया गया है । अन्तरद्वन्द्ध व्यक्ति की मानसिक अवस्था से जुड़ा होता है । साहित्य में जब द्वन्द्ध होता है तो इसमें पाठक श्रोता या प्रेक्षक के हृदय में तद्धव भाव÷संवेग कन उद्वेग होता है । चरित्र चित्रण का सुन्दर से सुन्दर रूप व्यक्ति के खण्डित मनोदशा में ही पाठक पाता है । नाटकों उपन्यासों, कहानियों में द्वन्द्ध का होना उसे अत्यधिक ग्राह्य बनाता है क्योंकि पाठक, श्रोता या प्रेक्षक काव्य कथा या नाटक में वही ढूँढते हैं जो उनके दैनिक जीवा का अंग होता है । द्वैद्ध की सत्ता जीवन में हमेशा से रही है और यही द्वैद्ध अन्तरद्वन्द्ध को जन्म देता है । इसी अन्तरद्वन्द्ध को हिन्दी की प्रसिद्ध कथाकार उषा प्रिम्वदा के कथा साहित्य में खोजने की कोशिश उक्त शोध पुस्तक में की गई है ।

नारी जीवन : विगत से वर्तमान (विश्लेषण) – नारी की नई सहस्त्राब्दी में सर्वदा एक नई छवि उभर रही है । नारी सदियों से जिस बेड़ी में जकड़ थी, उसे तोड़कर आज वह अपनी नई पहचान बनाने में जुटी हुई है । लेकिन देखा जाय तो, आज भी नारी अस्तित्व के असंख्य प्रश्न, महिला आन्दोलनों और जागरुकता के बाद भी उतने ही गम्भीर और चिन्ताजनक हैं जो सदियों पहले थे । उन प्रश्नों के चेहरे बदल गए हैं, परिधान बदल गए हैं लेकिन प्रश्नों का मूल स्वरूप आज भी यथावत है । कभी कभी लगता है, महिलाओं के प्रति बढ़ती विकृतियों का कारण पुरुष से अधिक वह सामाजिक सोच है जो जन्म से लेकर मृत्यु तक स्त्री पुरुष को अलग अलग नियमों में बाँधती है । पुरुष कभी देख ही नहीं पाता कि स्त्री के भीतर कितना और कैसा दर्द रिसता है । इसी दर्द को जानने और समझने का प्रयास है —नारी जीवन विगत से वर्तमान ।

विविधा (समालोचना) – साहित्य जीवन का मार्गदर्शक होता है । यह एक साथ अतीत, वर्तमान और भविष्य के दर्शन कराने में सक्षम होता है । कहते हैं साहित्यकार वो भी देख लेता है, जो उसके बाद घटित होने वाला है । साहित्य आत्म और अनात्म के सहित रहता है । विविधा में मेरी एक छोटी कोशिश है उन्हें छूने की जिन्होंने इस समाज और देश को परखा और उसकी व्याख्या की । इस पुस्तक में हिन्दी और नेपाली के कुछ मुख्य लेखकों को समेटने की कोशश की गई है ।

भाषा – सम्पादन : डा राम राजा प्रसाद सिंह (जीवनी)

प्रकाशक : राम राजा प्रसाद सिंह ट्रस्ट

भाषा–सम्पादन : गणेश मान सिंह (जीवनी)

प्रकाशक : गणेश मान सिंह ट्रस्ट

 

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