पायल कुमार : युवा ब्लॉगर एवं सफल एच.आर. प्रबंधक

मधुबनी के नेहरा गावं, सकरी में जन्मी और दरभंगा में ब्याही पायल कुमार अभी मुम्बई में एक राष्ट्रीय  रिटेल कंपनी (बॉम्बे डाइंग) में एच.आर. प्रबंधक के रूप में काम कर रही है और अभी अपने पति एवं पांच साल की पुत्री के साथ मुम्बई में ही रह रही है | पायल के पिताजी इलेक्ट्रॉनिक एंड कम्युनिकेशन्स इंजिनयर है और इंडियन आयल कॉर्पोरेशंस में कार्यरत हैं जो अभी राजकोट में नियुक्त हैं। इनकी माँ एक कुशल गृहिणी है । इनके दो जुड़वाँ भाई हैं औरो दोनों ही दिल्ली में निजी कंपनी में कार्यरत हैं। इनके ससूरजी सेवानिवृत्त इंजीनियर हैं और पीडब्लूडी, बिहार, दरभंगा जिले में कार्यरत थे। इनकी सासु माँ सरकारी स्कूल में टिचर थीं, उनका देहांत 2009 में हो गया। उनके नाम से इनके ससूरजी ने एक स्वयंसेवी संस्था की स्थापना की है – ज्योत्सना स्मृति शिक्षा समिति, जो की सरकारी स्कूल के मेघावी छात्रों को आर्थिक रूप से उनकी शिक्षा पूरी करने में मदद के लिए बनाइ गई है। इस स्वयंसेवी संस्था का उद्देश्य है की ग़रीब घरोंके मेधावी छात्रों को शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करना है । पायल बताती है की लेखन की तरफ इनका रुझान संभवतः इनकी किताबे पढ़ने के शौक से ही आया | पायल अपनी माता जी और अपने छोटे मामा जी को बचपन में बहूत सारे उपन्यास और रंगमंच से संबंधित किताबें पढ़ते देखी है, और इन्हीं दोनों से प्रभावित होकर इनको भी उपन्यास पढ़ने में रूची जगने लगी। इसी वजह से पायल ने गुजरात विश्वविधालय से अंग्रेजी साहित्य में स्नातक स्तर की पढ़ाई पूरी की | किताबों के पन्ने पलटते पलटते पता नहीं कब पायल ने पंक्तियाँ लिखनी शूरू कर दी और इनके परिवार और दोस्तों ने इस आकस्मिक शौक की सराहना भी की। 2013 में जब इनकी बेटी का जन्म हुआ और ये अपनी मातृत्व अवकाश पर थी, तब बेटी के सो जाने के बाद का ख़ाली समय का उपयोग करने के लिए इन्होने अपना सबसे पहला ब्लॉग लिखा, जिसको इन्होने फेसबुक पर भी पोस्ट किया और इनकी ब्लॉग को बहुत सराहना मिली। अक्सर इनके सहकर्मी और दोस्त जो की गैर बिहारी थे, इनको बोलते थे की अगर ये उनको अपने घर बुलाएंगी तो लिट्टी चोखा ही खिलाएंगी, क्यूँकि बिहारियों की एक वही मुख्य भोजन होती है, उनके अनूसार या तो फिर मेरे घर मनोज तिवारी के गाने ही चलते होंगे, या फिर मेरे ख़ानदान में एक नेता , एक आईएएस, एक इंजिनियर या एक डॉक्टर तो ज़रूर होगा। ऐसी बहुत सारी धारणाएँ बनी हूई थी इनके आस पास के लोंगो में, बिहार और बिहारियों के बारे में और ज़्यादातर जो की नकारात्मक ही थीं। उस साल छठ पूजा में इन्होने कुछ बहूत ही मनभावन फोटो खींचे जो बिहार की संस्कृति और परंपरा को दर्शाते हैं। ये फोटो इन्होने अपने ब्लॉग के लिए खींचे थे जीसका शीर्षक ‘सेलिब्रेटिंग बिहार’ रखा था इन्होने | इस ब्लॉग में इन्होने बिहार के मुख्य त्यौहारों के बारे में लिखा, जैसे – छठ पूजा, वट सावित्री पूजा, सामा चकेबा, हरतालिका तीज आदि । फेसबुक पे जैसे ही इन्होने अपनी फोटो पोस्ट की बिहारी और मैथिली समाज के अलावा बहुत सारे गैर बिहारी भी इनके सेलिब्रेटिंग बिहार ब्लॉग को बहुत सराहा गया और इनके गैर बिहारी दोस्तों ने माना की उन्हें नहीं मालूम था की बिहार भी इतना ख़ूबसूरत है। इनके इस ब्लॉग का उद्देश्य भी यही था की ये अपने बिहार की ख़ूबसूरती को लोगों तक ले जाये , जिसमें ये काफ़ी हद तक कामयाब रही। इसके उपरांत इनको एक सोशल मीडिया वेबसाइट वालो ने संपर्क किया | वो इनके सेलिब्रेटिंग बिहार ब्लॉग को अपने वेबसाइट पर प्रकाशित करना चाहते थे | इनके परिवार में साहित्य, लेखन, कला और रंगमंच को काफ़ी गंभीरता से लिया जाता है। इनके पतिदेव एक फैशन डिजाइनर हैं और स्केचिंग और पेंटिंग के तरफ़ उनकी रूची बचपन से रही है और इस रूची को घर वालों ने बढ़ावा दिया, जिसका नतीजा है की इनके पति ने क्रिएटिविटी की लाईन पकड़ कर निफ्ट मोहाली, पंजाब से फैशन डिजाइनिंग में डिप्लोमा किया। आज इनके पति रेमंड्स कंपनी, मुंबई में एक डिज़ाइन एंड प्रोडेक्ट हेड के रूप में कार्यरत हैं | इनके छोटे मामा जी रंगमंच से जूड़े हैं, और बिहार इप्टा के सचिव हैं। डॉ महेंद्र नारायण रिश्तेदारी में इनके ससुर लगेंगे जिनका मैथिली साहित्य में काफ़ी योगदान रहा है, वो इकलौते मैथिली साहित्यकार हैं जिन्होंने कारिख लोक गाथा बल्लाड लिखा है। पायल के परिवार ने इनके लेखन के शौक़ को काफ़ी प्रोत्साहित किया, और पायल ने भी अपनी लेखनी बिहार के लिए समर्पित कर दी । तदउपरांत पायल ने और भी ब्लॉग लिखे, बिहार के ख़ान पान, कला, गाँव, शहर और लोगों के बारे में। इनके काफ़ी और आर्टिकल भी ऑनलाइन प्रकाशित हुए | पायल अपने ब्लॉग की भाषा अंग्रेज़ी में रखने का वजह बताती है की अंग्रेज़ी भाषा को विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त है, और देखा जाए तो विश्व स्तर पर अत्याधिक लोग अंग्रेज़ी में पढ़ते, लिखते और बोलते हैं। इनकी लेखनी का एकमात्र उद्देश्य है की ये अपनी मैथिली और बिहारी सभ्यता, संस्कृति को विश्व स्तर तक पहुँचने में योगदान कर सके । इनका मानना है की मिथिला पेंटिंग या मधुबनी पेंटिंग ने पहले ही अपनी छाप छोड़ी हुइ है विश्व में, अब वक़्त है की बाक़ी चीज़ें भी बिहार की आगे आएँ। बहुत लोगों ने इनसे कहा की अब इनको मैथिली जो की इनकी मातृ भाषा है, उसमें लिखना शूरू करे । मैथिली में लिखने से इनके उद्देश्य का समाधान नहीं मिलेगा। मैथिली लिखना, पढ़ना, बोलना, मैथिली समाज के लिए अत्यंत आवश्यक है और भाषा हमेशा ज़िन्दा रहे, उसके लिए ज़रूरी है की आगे की पीढ़ी को मैथिली भी सिखाया जाए। इसी लिए पायल ने नव वर्ष में संकल्प ली है की ये मैथिली उपन्यास पढेंगी और मैथिली लीपी लिखना सीखेंगी ।

2018, सितम्बर में पायल को मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल के बारे में पता चला, जो की 19, 20, 21 दिसम्बर 2018 में, राजनगर के राज क़िले और नौलखा मंदिर में होने वाला था। इसी संदर्भ में इनकी बातचीत प्रो. सविता झा खान जो की मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल की व्यवस्थापिका और सेंटर फॉर स्टडीज ऑफ़ ट्रेडिशन एंड सिस्टम की प्रमुख हैं, से बात हुई । आपका उद्देश्य हमेशा ही आपको आपके जैसे लोगों तक ले जाता है, और फिर इन्होने अपनी फ्लाइट की टिकट बुक कर ली पटना के लिए। इसी दौरान मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल वालों ने स्मारिका प्रकाशित करने की घोषणा कर दी , और लेखकों को प्रोत्साहित किया की मिथिला से जूड़े हूए किसी भी मुद्दे पे लेख लिख कर भेजें। पहले पायल ने ये घोषणा देख कर टाल दिया के मिथिला के प्रसिद्द लेखकों के सामने तो वो कुछ भी नहीं है , इनके लेख को तो पैनल देखेंगे भी नहीं, और फिर ये एक विश्व स्तर का कार्यक्रम होने वाला था, देश विदेश से मैथिली साहित्य के दिग्गज आने वाले थे। ये सब सोच कर इन्होने मन बना लिया की ये कोशिश भी नहीं करेंगी इसमें हिस्सा लेने का। लेकिन इनके पति ने इनको बहुत प्रोत्साहित किया की इनको कोशिश करनी चाहिए। पायल इस स्मारिका लेखी में हिस्सा लेने की इच्छा जाहिर की प्रो. सविता से और ये भी शेयर किया की ये किस मुद्दे पर लिखना चाहेंगी, इस पर उन्होंने बड़े ही उत्साह से पायल का मनोबल बढ़ाया और कहा की पायल आपने जिस मुद्दे का चयन किया है वे सब बहुत ही अद्वितीय हैं। पायल ने तीन लेख अलग अलग मुद्दों पर अंग्रेज़ी में लिख कर मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल वालों को स्मारिका के लिए भेजा। दो महीने तक कोइ भी अपडेट नहीं आया लेख के चयन का। पायल को आभास होने लगा, की अभी अपनी लेखनी में बहुत मेहनत करनी पड़ेगी अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहुँचने के लिए। अब तो पायल यह मान चुकी थी की तीनों लेख स्वीकार नहीं किये गए है । दिसम्बर के पहले हफ़्ते में इनको मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल के व्यवस्थापक के टीम से सन्देश आया की इनके एक लेख का चयन हो गया है | मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल की स्मारिका – अहिबात, में प्रकाशित होने के लिए। इनके और इनके परिवार वालो की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा यह सुनने के बाद। फिर इन्होने मिथिला के हाट बाज़ार पर लेख लिखा था, जिसका चयन हुआ था ‘अहिबात’ के लिए। इस लेख में इन्होने अपने बचपन की, गाँव के हाट बाज़ार के बारे में , गाँव के साधारण जीवन शैली और गृह उद्दोग को प्रमुखता से स्पष्ट की है |

किसी भी लेखिका/लेखक के लिए ये बहुत बड़ी बात होती है की उसका लिखा हूआ काग़ज़ी रूप में प्रकाशित हो, चाहे वो न्यूज़ पेपर में हो या किसी मैगज़ीन या जर्नल में । अहिबात में इनके लेख का प्रकाशित होना इनके लिए ऐसा अहसास लाया जैसे की लेखनी का विवाह काग़ज़, काली स्याही के साथ हुइ हो, क्यूँकि अहिबात मैथिली शब्द है- सौभाग्यवती भव के लिए। एक लेखिका के रूप में इनकी यात्रा की ये एक शुभ मंगल शुरूआत थी । पायल की एक अंग्रेजी उपन्यास वर्ष २०१९ में प्रकाशित होने वाली है, यह उपन्यास मैथिली ग्रामीण जीवन शैली, मैथिली परंपरा और सभ्यता, कला पर आधारित है। कहानी की मुख्य किरदार एक मैथिल विधवा है और सामाजिक रूढ़िवादी धारणाओं को पायल ने इस विधवा नायक की कहानी से दर्शाने का प्रयास किया है, कि हमें अपनी परंपरा, सभ्यता और धरोहर को जिवित रखने और आगे बढ़ाने के लिए बदलाव को अपनाना ही पड़ेगा क्यूँकि, समय, समाज, देश, पहले ही बहुत आगे निकल चुके हैं और हम अभी भी कछुए की चाल चल रहे हैं।

भविष्य में पायल अपने आप को एक लेखक के रूप में देखना चाहेंगी । किताबें पढ़ने की तरफ़ बचपन से रुझान रहा है इनका, किताबें घर की तरह होती हैं, बड़ी मेहनत, प्रेम और लगन से लिखी जाती हैं। कोई भी किंडल ऐप, किताबों के पन्नों की ख़ुशबू का स्थान नहीं ले सकते है | पायल युवा साहित्यकारों को संदेश देना चाहती है की अपनी लेखनी को एक मक़सद दें, जिससे समाज में कुछ बदलाव आ सके। बिहार को आगे लाने के लिए ख़ास तौर से यूवा पीढ़ी की बहुत ज़रूरत है | लेखनी में बहुत ताक़त है, और मैं सददत हसन मंटो के सोच पर अमल करती हूँ की हर तरह की लेख अपने आप में एक साहित्य है, साहित्य और लेखनी हवा और पानी की तरह है। इनपे कोई बन्दीशें नहीं हैं। साहित्य में ही समाज में बदलाव लाने की प्रेरणा और ताक़त दोनों है ।

पायल अपने पति और बेटी के साथ

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